मुहावरे और लोकोक्तियाँ प्रयोग|muhavare in hindi

मुहावरे और लोकोक्तियाँ प्रयोग क्या है? muhavare in hindi

“जब कोई पद-समूह (जो वाक्य नहीं है) वाक्य में इस प्रकार प्रयुक्त हो कि अपने वाच्यार्थ को छोड़कर कोई विलक्षण अर्थ प्रकट करे तब ऐसे प्रयोग को और इस प्रकार प्रयुक्त पद-समूह को ‘मुहावरा’ कहते हैं।”

मुहावरा, सदैव लक्षणा शक्ति से अपने अर्थ को अभिव्यक्त करता है। इसके प्रयोग से  भाषा सबल, सहज, सटीक और प्रवाहपूर्ण हो जाती है। इतना ही नहीं, इसके प्रयोग से शैली भी चमत्कारपूर्ण हो जाती है। हम जानते हैं कि संक्षिप्तता शैली का एक प्रधान गुण है। मुहावरों में थोड़े-से शब्दों में बहुत अधिक भाव गुंफित रहते हैं।

अतः, इनसे भाष  जीवंत और रोचक हो जाती है। यही कारण है कि अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ का कविताएँ बहुत ही लोकप्रिय और गेय हो सकी हैं।

नीचे देखें कुछ ऐसी ही पंक्तियाँ :
“मैं झिझक उठा, हुआ बेचैन-सा,
लाल होकर आँख भी दुखने लगी।
मूंठ देने लोग कपड़े की लगे,
ऐंठ बेचारी दबे पाँवों भगी।”  (हरिऔध)

वे लोहा पीट रहे हैं
तुम मन को पीट रहे हो
वे पत्तर जोड़ रहे हैं,
तुम सपने जोड़ रहे हो !  (नागार्जुन)

दाढ़ी में तिनका बता, देखें सबकी ओर
झाड़ रहा दाढ़ी वही, जो था असली चोर   (काका हाथरसी)

मुहावरे (muhavare)के प्रयोग में निम्नलिखित सावधानियां बरतनी चाहिए :

1, मुहावरे वाक्यों में ही शोभते हैं, अलग नहीं। जैसे—यदि कहें ‘कान काटना’ तो इसका कोई अर्थ व्यंजित नहीं होता; किन्तु यदि ऐसा कहा जाय—’वह छोटा बच्चा   तो बड़े-बड़ों के कान काटता है’ तो वाक्य में अद्भुत लाक्षणकता, लालित्य और  प्रवाह स्वतः आ जाता है।

2. मुहावरों का प्रयोग उनके असली रूपों में ही करना चाहिए। उनके शब्द बदले नहीं  जाते हैं। उनके पद-समूहों में रूप-भेद करने से उसकी लाक्षणिकता और विलक्षणता  नष्ट हो जाती है। जैसे-‘नौ-दो ग्यारह होना’ की जगह ‘आठ तीन ग्यारह होना।

3. मुहावरे का एक विलक्षण अर्थ होता है। इसमें वाच्यार्थ का कोई स्थान नहीं होता।

4. मुहावरे का प्रयोग प्रसंग के अनुसार होता है और उसके अर्थ की प्रतीति भी  प्रसंगानुसार ही होती है। जैसे—अमरीका की नीति को सभी विकासशील राष्ट्र धोखे और अविश्वास की मानते हैं। यदि ऐसा कहा जाय—’पाकिस्तान अपना उल्लू सीध  करने के लिए अमीरीका की आरती उतारता है’-तो यहाँ न तो टेढ़े उल्लू को सीधा  करने की बात है, न ही, दीप जलाकर किसी की आरती उतारने की। यहाँ दोनों  की प्रकृति से अर्थ निकलता है—’मतलब निकालना और ‘खुशामद करना’।

अतएव, मुहावरे का प्रयोग करते समय इस बात का सदैव ख्याल रखना चाहिए कि  समुचित परिस्थिति, पात्र, घटना और प्रसंग का वाक्य में उल्लेख अवश्य हो । केव वाक्य-प्रयोग कर देने पर संदर्भ के अभाव में मुहावरे अपने अर्थ को अभिव्यक्त  नहीं कर सकते हैं।

नीचे लिखे उदाहरणों पर ध्यान दें-

1. शेर को देखते ही हिरण नौ दो ग्यारह हो गया।

व्याख्या : शेर, हिरण का शिकार करता है; क्योंकि वह शेर का भक्ष्य है। कोई जीव  जान-बूझकर मरना नहीं चाहता। अतएव, शेर को देखकर हिरण अपनी जान बचाने के   लिए भागेगा ही। ‘नौ दो ग्यारह होना’ का अर्थ व्यंजित हुआ—’भाग जाना।
2. पुलिस को देख चोर नौ दो ग्यारह हो गया।

व्याख्या : पुलिस कानून का रक्षक है और चोर गैरकानूनी और असामाजिक काम  करनेवाला, इसलिए पुलिस के सामने चोर रहना नहीं चाहेगा; वह भागेगा ही। यदि सीधे ऐसा वाक्य बनाया जाय—’हिरण नौ दो ग्यारह हो गया’ या ‘चोर नौ दो
ग्यारह हो गया’-‘तो मुहावरे का अर्थ बिल्कुल स्पष्ट नहीं हो पाएगा

विभिन्न मुहावरे और उनके अर्थ hindi muhavre in meaning

100 लोकोक्तियाँ 

1. अंक भरना : लिपटा लेना
2. अंक लगाना : गले लगाना
3. अंकित करना : अच्छी तरह बैठ जाना
4. अंकित होना : अच्छी तरह बैठ जाना
5. अंकुश रखना : नियंत्रण में रखना
6. अंग भरना : जवानी के लक्षण दिखना
7. अंग टूटना/अंग-अंग टूटना : दर्द होना
8. अंग-अंग ढीला होना : शिथिल पड़ना
9. अंगार उगलना : कड़वी बातें कहना
10. अंगार बनना : क्रुद्ध होना
11. अंगार बरसना : चिलचिलाती धूप होना
12. अंगुली काटना पछताना/चमत्कृत होना
13. अंगूठा दिखाना : धोखा देना/ चिढ़ाना
14. अंगूठा चूमना खुशामद करना
15. अंचल पसारना : माँगना
16. अंड-वंड बकना : व्यर्थ बकना/ गाली देना
17. अंडा सेना : बेकार रहना/किसी वस्तु का बहुत ख्याल करना
18. अंत करना: खत्म करना
19, अंत न पाना: रहस्य न जान पाना
20. अंत पा लेना : रहस्य पा लेना
21. अंधा बनना : बिना सोचे-विचारे कुछ करते जाना
22. अंधा बनना : धोखा देना। मूर्ख बनाना
23. अंधे की लकड़ी/लाठी: एकमात्र सहारा
24. अँधेर छाना : बहुत गड़बड़ी फैलना
25. अँधेर नगरी : अत्यन्त अन्याय
26. अँधेरा छाना : शोक छाना
27. अँधेरे घर का उजाला इकलौता पुत्र
28. अंधेरे मुँह : प्रातःकाल
29. अकड़ जाना : जिद्द पर डटे रहना
30. अक्ल का अजीर्ण होना : मूर्ख होना
31. अक्ल का दुश्मन होना : महामूर्ख होना
32. अक्ल चकराना/चक्कर खाना : चकित होना
33. अक्ल चरने जाना/अक्ल पर पत्थर पड़ना : बुद्धि से काम न लेना
34. अगर-मगर करना : टाल-मटोल करना
35. अच्छी बीतना : आनन्द से समय गुजरना
36. अछूता होना : बेदाग होना
37. अट-पट बोलना : बेकार की बातें/गाली देना
38. अट्टहास करना : जोर से हँसना/व्यंग्य से हँसना
39. अठखेलियाँ करना : समय व्यर्थ गँवाना
40. अड्डा जमाना/मारना : जमकर रहना
41. अडंगा लगाना/डालना : बाधा डालना
42. अथाह सागर में डूबना : कष्टों से घिर जाना
43. अनजान बनना : जानते हुए भी अनजान का स्वांग
44. अनबन रहना : झगड़ा/मनमुटाव होना
45. अनसुनी करना : परवाह न करना
46. अन्न-जल उठना: मृत्यु के करीब होना
47. अपना उल्लू सीधा करना: अपना स्वार्थ साधना
48. अपना किया पाना : कर्म का फल भोगना
49. अपना ठिकाना करना : रहने/जीविका का प्रबंध करना
50. अपना राग अलापना : केवल अपनी ही बात कहना  आता
51. अपना-सा मुँह लेकर रह जाना-लज्जित होना
52. अपनी-अपनी पड़ना : सभी का स्वार्थी होना
53. अपनी खिचड़ी आप पकाना : सबसे अलग रहना
54. अपनी नाक कटा दूसरे की यात्रा बिगाड़ना : स्वयं का नुकसान कर दूसरे क  हानि पहुँचाना
55. अपनी नींद सोना : निश्चित रहना
56. अपने तक रखना किसी से न कहना
57. अपने पाँव आप कुल्हाड़ी मारना : अपना अनिष्ट स्वयं करना
58. अपने पाँव पर खड़ा होना : स्वावलम्बी होना
59. अपने मुँह मियाँ मिठू बनना : अपनी प्रशंसा आप करना
60. अपने सिर लेना : अपने ऊपर लेना/स्वीकार करना
61. अपने हाथों कब्र खोदना : अपना नाश स्वयं करना
62. अब तंब करना : हील-हवाला करना/ मृत्यु के करीब
63. अरमान ढंडे पड़ना/ अरमान दिल में रह जाना : इच्छा पूरी न होना
64. अरमान निकालना : इच्छा पूरी करना
65. अर्द्धचन्द्र देना : गर्दनियाँ देना
66. अवसर चूकना : मौका खोना
67. अवस्था ढलना : बुढ़ापा आना/काफी उम्र होना
68. अधीर होना : धैर्य खोना
69. आँख आना/उठना : आँख की बीमारी
70. आँख उठाकर न देखना : ध्यान न देना/ उपेक्षा करना
71. आँख उलट जाना : मरणासन्न कृतघ्न होना
72. आँख ऊपर न उठना : लज्जित होना
73. आँख से ओझल होना : नजर से दूर होना
74. आँख का अंधा गाँठ का पूरा : धनी पर मूर्ख/मूर्ख धनवान
75. आँख-कान खुला रखना : चौकस रहना
76. आँख की पुतली होना : अत्यधिक प्यारा होना
77. आँख खुलना : होशियार होना/ नींद टूटना।
78. आँख खोलकर देखना : होशियारी से विचार करना
79. आँख गड़ना/गड़ जाना : लालच होना
80. आँख सेंकना/ठंडी करना/गरम करना : तृप्त होना
81. आँख चरने जाना : सामने की वस्तु न दिखना
82. आँखें चार होना : प्यार होना
83. आँख चुराकर जाना चुपके से निकल जाना
84. आँख झपकना : नींद/आलस्य आना

85 ऊपर की आमदनी: अवैध कमाई
86, एक की दस सुनाना : कड़ा उत्तर देना
87. एक टाँग पर खड़ा रहना : हमेशा तैयार
88. एक-दो-तीन होना: नीलाम होना
89. एक न चलना : कोई उपाय न चलना
90. एक लाठी से हाँकना : सबके साथ एक-सा बर्ताव करना
91. एक ही भाव तौलना : सबके साथ एक-सा बर्ताव करना
92. एक हाथ से ताली न बजना : एक तरफ से कुछ न होना
93. एक ही थैली के चट्टे-बट्टे : सभी एक
94. एड़ी घिसना : दौड़-धूप करना
95. एड़ी-चोटी का पसीना एक करना : बहुत प्रयास करना
96. एड़ी से चोटी तक आग लगना : अत्यंत क्रुद्ध होना
97. एहसान मानना : आभारी होना
98. एहसान फरामोश होना : कृतघ्न होना
99. ऐंठ-ऐंठ कर रह जाना : मन मसोस कर रहना
100. ऐंठ कर चलना= गर्व से चलना
101. ऐंठ लेना : धोखे से लेना
102, ऐसी-तैसी करना : इज्जत खराब करना
103. ऐसा-वैसा न होना: असाधारण
104 देना : विपत्ति में पड़ना
105 ओछे की प्रीति : नीचों की मित्रता
106 ओठ काटना/चबाना: गुस्सा करना
107  ओठ तक  न हिलना : कुछ न बोलना
108 कलेजा टूक-टूक हाना: हृदय पर गहरी चोट पड़ना
109, कलेजा ठंडा होना संतोष होना
110. कलेजा धक-से हो जाना: स्तब्ध रह जाना
111. कलेजा निकालकर रख देना: दिल की बात कहना
112. कलेजा पकना दुःखी होना
113. कलेजा पत्थर का होना : पत्थर दिल होना
114, कलेजा फटना दुःखी होना
115. कलेजा मुँह को आना : दुःख से पीड़ित होना
116. कलेजा हाथभर का होना : हिम्मती होना/खुश होना
117. कलेजे पर हाथ रखना : ठंडे दिल से सोचना
118. कसक मिटाना/कसर निकालना : बदला लेना
119. कहने में आना : बहकावे में पड़ना
120. काँटा निकल जाना : द्वेष निकालना
121. काँटा बोना/ बिछाना : अनिष्ट करना
122. कागज काला करना : व्यर्थ लिखना
123. कागज की नाव : अस्थायी
124. कागजी घोड़े दौड़ाना : व्यर्थ की लिखा पढ़ी
125. काटने दौड़ना : क्रुद्ध रहना
126. काटो तो खून नहीं : कुछ अप्रत्याशित बात सुनकर स्तब्ध रह जाना
127. काठ का उल्लू : मूर्ख
128. काठ की हाँड़ी: अस्थायी
129. काठ मारना : सन्न रहना
130. कान कतरना : बढ़ा-चढ़ा रहना
131. कान खड़े होना : चौकन्ना होना
132. कान न दिया जाना : बहुत शोर होना
133, कान देना : ध्यान देना
134, कान पकड़ना : शपथ लेना
135. कान पर जूं नरेंगना : बेफिक्र होना
136. कान भरना/फूकना : चुगली करना
137. कानी कौड़ी न होना : दरिद्र होना
138. काफूर होना: भाग जाना
139. काम आना: वीरगति प्राप्त होना
140. काम तमाम करना
141. काम निकालना : स्वार्थ सिद्ध करना
142, काया पलटना: आमूल परिवर्तन
143. खुदा की मार : दैवी प्रकोप
144. खुल्लम-खुल्ला कहना : सबके सामने
145. खुशामदी टटू : बड़ाई करनेवाला
146. खूटे के बल कूदना : दूसरे के भरोसे उछलना
147. खून उतरना/उबलना/खौलना : कुद्ध होना
148. खून सफेद होना : कृतघ्न होना
149. खेत आना : मरना
150. खोपड़ी खा जाना : बेकार की बातें करना
151. खोपड़ी खुजलाना : मार खाने की इच्छा
152. ख्याली पोलाव पकाना : केवल कल्पना करते रहना
153. गंगाजल उठाना : गंगा की शपथ लेना
154. गंगा नहा लेना : किसी महत्त्वपूर्ण काम से मुक्ति
155. गंगा लाभ होना : मृत्यु होना
156. गजभर की छाती होना : बहुत छाती होना
157. गड़ा मुर्दा उखाड़ना : बीती बात को सामने लाना
158. गढ़ जीतना : बड़ा काम करना
159. गताल खाते जाना : डूबना
160. गम खाना : धीरज रखना
161. गर्दन उठाना : विद्रोह करना
162. गर्दन झुकना : लज्जित होना
163. गर्दन पर छुरी फेरना/गला काटना : नुकसान करना
164. गर्दन पर सवार होना : हमेशा पीछे लगा रहना
165. गले छुड़ाना : छुटकारा पाना
166. गला फँसना : झमेले में पड़ना
167. गली-गली मारा फिरना : अपमानित होकर भटकते रहना
168. गहरा हाथ मारना : बहुत धन पाना
169. गहरा छनना/गाढ़ी छनना : बहुत दोस्ती
170. गाल फुलाना : रूठना
171. गिरगिट की तरह रंग बदलना : परिवर्तनशील/कभी एक बात पर नहीं
172. गुड़ गोबर करना: बना काम बिगड़ना
173. गुरुघंटाल होना : चालबाज होन
174. गुलछर उड़ाना : मौज करना
175. गुस्सा नाक पर: तुरत गुस्से में आना
176. ठठरी होना : अत्यंत क्षीणकाय होना
177. ठन जाना : मुकाबला होना
178. ठन-ठन गोपाल होना : कुछ न रहना
179. ठसक दिखाना : घमंड दिखाना
180. ठाट-बाट में रहना : शान-शौकत में रहना
181. ठिकाने की बात : बुद्धि की बात
182. ठिकाना न रहना : अस्थिर होना/ कहीं जगह न मिलना
183. ठिकाने लगना : मर जाना
184. ठीकरा समझना : तुच्छ समझना
185. ठेंगा दिखाना : धोखा देना
186. ठेस लगना : धक्का लगना
187. ठोक बजाकर लेना : जाँच-पड़ताल करके लेना
188. ठोकर खाना : धोखा खाना
189. ठोकर खाते फिरना : मारा-मारा फिरना
190. ठोड़ी पर हाथ धरकर बैठना : कुछ सोचना
191. डंक मारना : कड़ी बात कहना
192. डंका पीटना : खुल्लम-खुल्ला
193. डंके की चोट पर : स्पष्ट रूप से
194. डंड पेलना : कसरत करना/भूख लगना
195. डंड भरना : जुर्माना देना
196. डंडी मारना : कम तौलना
197. डकार जाना: हजम कर जाना
198. डकार न लेना : हजम कर पता भी न लगने देना
199. डट जाना: जमना
200. डपोरशंख होना : बुधू होना
201. डांवाडोल होना: अस्थिर होना
201. डाका पड़ना : किसी बहुमूल्य चीज का
202. डाढ़ मारकर रोना : फूट-फूटकर रोना
203. डाली देना : बड़े अफसर को मेवा-फल के साथ रुपये-आभूषण देना
204. डींग हाँकना : बढ़-चढ़ कर बातें करना
204. डीठ मारना : नजर लगाना
205. डुबकी लगाना : लापता होना
206. डूब जाना : खत्म होना
207. डूबता उतराता रहना : चिन्तन में डूबे रहना
208. डूबती नैया को पार लगाना : आफत से निकालन

कहावतें/लोकोक्तियाँ-  kahawat muhavre  hindi 

हमलोगों को उचित है कि दूसरों के लिए जिएँ। जो तन-मन-धन से परोपकार करते  हूँ, वे ही धन्य हैं। यदि अपने ही लिए जन्म गँवा दिया तो क्या किया? अपना पेट तो कुत्ता भी भर लेता है।
उपर्युक्त अनुच्छेद में ‘अपना पेट तो कुत्ता भी भर लेता है’-मुहावरा नहीं, कहावत  है। कुछ लोग मुहावरों और कहावतों में कोई अंतर नहीं मानते ।

मुहावरे वाक्यांश होते हैं, जबकि कहावतें अर्थ को पूर्ण रूप से स्पष्ट करनेवाले स्वतंत्र  वाक्य। किसी महापुरुष या संत के कहे हुए शब्दों या उक्तियों को सिद्धांत वाक्यों की तरह प्रयोग में लाना ‘कहावत’ है।

अतः, यह स्वीकार करना चाहिए कि कहावतें अपना स्वतंत्र महत्त्व रखती हैं। कहावतों में एक पूर्ण सत्य या विचार निहित रहता है। इसमें  लोक व्यवहार की सच्चाई भरी रहती है। साथ ही, लोक-व्यवहार की तीव्र आलोचना भी। कहावत के सुनते ही एक विचार-शृंखला हृदय में गूंज उठती है। जैसे—शिकार को गए,  खुद हो गए शिकार, सब धान बाईस पसेरी; सब बात खोटी, मुख्य दाल-रोटी, हिन्दी न फारसी मियाँ जी बनारसी आदि।
मुहावरों का प्रयोग वाक्य में चमत्कार उत्पन्न करने के लिए किया जाता है, जबकि कहावत किसी कही हुई बात के समर्थन में प्रयुक्त होती है। गंभीर व्यंग्य को अप्रत्पक्ष रूप से श्रोता के मन में उतारने या कड़वी बात को शिष्टाचारपूर्वक व्यक्त करने के लिए  कहावतों का प्रयोग बड़ा ही सटीक होता है। जैसे-
1. भाई, क्या कहें ! राज्य सरकार की स्थिति बड़ी ही बुरी है। पुराने तजुर्बेकार राजनीति-  निष्णात लोगों की कोई पूछ नहीं रह गई है। कुछ चालबाज लोगों ने ऐसा प्रपंच रच रखा है कि उनके सामने किसी की चलती ही नहीं। अफसोस है, ‘साईं घोड़न के
अछत गदहन पायो राज।
2. मुख में चारि वेद की बातें, मन परधन परतिय की घातें।
धनि बगुला भगतन की करनी, हाथ सुमरनी बगल कतरनी ।।
3. अथिर अपव्यय जनित जस, अवसि नस इहि साख ।
चार दिनों की चाँदनी, फिर अँधेरी रात ।।
4. जहाँ राखन चाहहु व्यवहार, अधिक रखहु तहँ न्याय विचार ।

5 . अधजल गगरी छलकत जाय: अज्ञानी ही बढ़-चढ़कर ज्ञान की बातें करता है।
6 . अंडा सिखाए बच्चे को कि ची-ची मत कर: छोटे का बड़े को नसीहत देना।
7 . अधा क्या चाहे दोनों आँखें: जरूरतवाले की जरूरत पूरी होती हो तो और उसे
अंधी पीसे, कुत्ता खाय: कमाए कोई, उड़ाए कोई और
8, अंधा बाँटे रेवड़ी, फिरि-फिरि अपनों को दे: अपनों ही का बराबर फायदा पहुँचाना।
9. अँधेर नगरी चौपट राजा, टके से भाजी, टके सेर खाजा: अत्याचारी और मूर्ख
राजा के लिए प्रयुक्त
10. अंधों के आगे रोना, अपना दीदा खोना : नासमझ को समझाने का व्यर्थ प्रयास
11. अंधे के हाथ बटेर लगी : अपात्र को कोई बहुमूल्य चीज मिल जाना ।
12. अंधों में काना राजा : मूरों के बीच कम पढ़ा लिखा सदैव आदर पाता है।
13. अपनी ढाई चावल की खिचड़ी अलग पकाना/अपनी ढाई ईंट की मस्जिद अलग
बनाना : सबसे अलग होकर कोई काम करना
14. अपनी-अपनी डफली, अपना-अपना राग : एकमत होकर काम न करना
15. अपनी करनी पार उतरनी : अपने ही कर्मों का फल पाना।
16. अपनी गली में कुत्ता भी शेर होता है : अपनी जगह डरपोक भी बहादुर होता है।
सहायक के भरोसे निर्भयता और साहस दिखाना ।
17. अपने दही को खट्टा कौन कहता है ? : अपनी वस्तु किसे नहीं अच्छी लगती?
18. अपने मुँह मियाँ मिठू बनना : अपने मुँह अपनी ही बड़ाई करना।
19. अब पछताए होत क्या, जब चिड़ियाँ चुग गई खेत : पहले से सावधानी नहीं बरती तो काम बिगड़ जाने के बाद पछताना व्यर्थ है।
20. अशर्फियों की लूट कोयले पर छाप : अधिक नुकसान की चिन्ता-न कर कम नुकसान पर दुखी होना।
21. अक्ल बड़ी या भैंस : जो काम बल से नहीं होता, वह बुद्धि से होता है
22. अक्लमंद को इशारा, बेवकूफ को तमाचा : बुद्धिमान तो इशारे से ही समझक काम करते हैं; किन्तु मूर्ख तमाचे खाकर
23. अस्सी की आमद चौरासी का खर्च : आमद से ज्यादा खर्च
24. आँसुओं से प्यास नहीं बुझती : रोने से दिल का अरमान पूरा नहीं होता
25. उल्ला चोर कोतवाल को डॉट : एक तो अपराध किया, वह माना नहीं, उल्टे दूसरे
को धमकाता है।
26. उल्टे बोस पहाड चढ़ाना/उल्टे बॉस बरेली को : उल्टा काम करना
27, ऊंची दुकान, फीका पकवान : प्रसिद्ध तो ज्यादा; परन्तु योग्यता कुछ नहीं
28. ऊँट के मुँह में जीरा : बहुत थोड़ा
29. ऊँट चढ़े पर कुत्ता काटे : भाग्य का खोटापन हर वक्त सताता है।
30. ऊँट देखिए किस करवट बैठे : देखें परिणाम क्या होता है।
31. ऊधो का लेना न माधो का देना : बिल्कुल निश्चित
32. ऊखल में दिया सर तो मूसलों का क्या डर : जब एक मुसीबत खुद खरीद ली है या
एक मुश्किल काम में हाथ डाल दिया है तो अब रास्ते की तकलीफों से क्या डरना।
33. एक अनार सौ बीमार : वस्तु कम, माँगें ज्यादा।
34. एक तीर दो निशाने : एक ही उपाय से दो कामों का होना
35. एक तो करेला कड़वा, दूसरे नीम चढ़ा : एक तो कोई व्यक्ति पहले से ही बुरा था,
अब उसे बुरी संगति भी मिल गई।
36. एक तो चोरी दूसरे सीना जोरी : एक तो अपराध किया, दूसरे जबान लड़ाता है।
37. एक पंथ दो काज : एक ही उपाय से दो काम
38. ओछे की प्रीत बालू की भीत : छोटे दिलवाले की दोस्ती रेत की दीवार की तरह
कमजोर होती है।
39. एक हाथ से ताली नहीं बजती : दोनों पक्षों का अपराध होना
40. ओस चाटे प्यास नहीं बुझती : थोड़ी चीज से ज्यादा चाहनेवाले को तसल्ली नहीं मिलती
41, कभी नाव पर गाड़ी, कभी गाड़ी पर नाव : समय किसी का एक-सा नहीं रहता ।
42. कहाँ राजा भोज कहाँ गंगू तेली : कहाँ तुम्हारा घटिया दर्जा और कहाँ इतना बड़ा
आदमी, जिसकी बड़ाई कर रहे हो।
43. कहीं का ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमती ने कुनवा जोड़ा : इधर-उधर की अनमोल बातें।
44. कहीं बूढ़े तोते भी पढ़े हैं? : पुरानी उम्र के आदमी नये काम सीख नहीं पाते ।
45. काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती : धोखे का व्यापार बार बार नहीं।
46. काबुल में क्या गधे नहीं होते : अच्छे बुरे सभी जगह होते हैं।
47.खेत खाय गदहा, मार खाय जोलहा : अपराध किसी का दंड किसी को
48. खोटा सिक्का भी बुरे वक्त पर काम आता है : विपत्ति के समय निकम्मी चीज भी  काम कर जाती है।
49. खोदा पहाड़, निकली चुहिया : परिश्रम बहुत अधिक; फल बहुत थोड़ा
50. गुड़ खाए, गुलगुले से परहेज : दिखावटी परहेज
51. गुरु गुड़, चेला चीनी : चेले की योग्यता गुरु से बढ़ जाना
52. गोद में बच्चा, नगर में ढिंढोरा : पास की वस्तु की तलाश इधर-उधर
53. घर का जोगी जोगड़ा, आन गाँव का सिद्ध : कोई व्यक्ति चाहे कितना ही गुणवान् क्यों न हो अपने लोगों के बीच मान नहीं पाता
54. घर का भेदी लंका ढाये/डाहे : घर के छिपे हुए भेद जाननेवाला बहुत बर्बादी लाया ।
55. घर की मुर्गी दाल बराबर : घर की चीज को महत्त्व नहीं
56. चट मँगनी पट ब्याह : किसी काम का जल्दी संपन्न होना।
57. चमड़ी जाय तो जाय, दमड़ी न जाय : सख्त सजा मिले तो मिले, मगर दौलत हाथ से न जाए।
58. चलती का नाम गाड़ी : जब तक आदमी के हाथ पाँव चलते हैं तब तक काम होते  रहते हैं।
59. काम प्यारा होता है चाम नहीं : काम करनेवालों की कद्र होती है, सूरत की नहीं।
60. चार दिनों की चाँदनी फिर अँधेरी रात: थोड़े दिनों की शानो शौकत ।
61. चिराग तले अँधेरा : गुणी के घर अगुणी ।
62. चोर का भाई जेबकतरा : ऐसा दुराचारी व्यक्ति जो किसी दोषी का पक्ष ले और
63. चोर की दाढ़ी में तिनका : अपराधी हमेशा सशंकित रहता है ।
64. चोर-चोर मौसेरे भाई : एक ही पेशेवाले आदमी।
65. चोर चोरी से जाय तुम्बाफेरी से नहीं : आदत छोड़ देने पर भी कुछ न कुछ प्रभाव  करता ह
66.छुछून्दर के सिर पर चमेली का तेल: कुपात्र को उत्तम वस्तु मिलना।
67. जान बची लाखों पाय: शुक्र है कि जान बच गई।
68. जान है तो जहान है : प्राणरक्षा प्रथम कर्त्तव्य है।
69. जितना ही गुड़ डालो, उतना ही मीठा जितना धन खर्च करोगे, उतनी ही अच्छीचीज मिलेगी।
70. तेते पाँव पसारिए, जेती लंबी सौर : अपनी औकात देखकर ही खर्च करो।
71. जितने मुँह, उतनी ही बातें अपनी-अपनी समझ से हर कोई कुछ न कुछ कह जाता है।
72. जिसका खाए उसका गाए : उपकारी के प्रति कृतज्ञ होना ।
73. जिसकी बनरी वही नचावे : जिसका जो काम है वही उसे ठीक से कर सकता है।
74. जिसकी लाठी उसकी भैस : जोरवाले का ही सब कुछ
75. जिसके पाँव न फटी बिवाई, वह क्या जान पीर पराई : जिसको खुद तकलीफ नही   हुई वह दूसरे की तकलीफ क्या समझेगा।
76. जिसे पिया चाहे वही सुहागन : जिसको मालिक चाहे वह बुरा भी अच्छा ।
77. जैसा देश, वैसा भेस : जहाँ रहें वहीं के नियमानुसार
78. जैसी करनी, वैसी भरनी: अपने किए का फल पाना ।
79. जो गरजे सो बरसे नहीं : बहुत बातें बनानेवाला काम के लायक नहीं होता ।
80, जो जागे सो पावे, जो सोवे सो खोवे : होशियार ही फायदा लेता है।
81.जो बोओगे सो काटोगे : नेकी का फल नेक और बदी का बुरा ।
82. झूठे का मुँह काला, सच्चे का बोलबाला : अंततः सत्य की ही जीत होती है।
83. रहे झोपड़ी में, ख्वाब देखे महलों का : औकात बढ़कर सपने देखना।
84. ठंडा लोहा गर्म लोहे को काटता है : क्रोधी को नम्र शांत कर देता है।
85. डायन भी दस घर बख्स देती है : अन्यायी भी पड़ोसी से हिल-मिलकर रहता है।
86. ढाक के तीन पात : परिणाम कुछ भी नहीं।
87. ढोल के अन्दर पोल : दिखावा कुछ और गुण कुछ नहीं।
88. तन सुखी तो मन सुखी : तंदुरूस्ती में ही स्वच्छ मन
89. तलवार का घाव भर जाता है, बात का नहीं भरता कटु वचन बराबर याद रहते हैं।
90.ताने घर के बाने घाट : संपन्न स्थिति।
100. तू डाल-डाल, मैं पात-पात : तुम चालाक तो मैं भी चालाक ।

लेख के बारे में-

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