पत्र लेखन हिंदी | Patra Lekhan

पत्र  लेखन एक कला है। अपने दूरस्थ संबंधियों तथा मित्रों से अपने मन की बातसकता है, जिसकी भाषा सरल और भाव स्पष्ट हों। इतिहास साक्षी है कि पं. नेहरू कहने का अच्छा और सबसे सस्ता साधन है-पत्र। वह पत्र अधिक शक्तिशाली होसामाजिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, भौगोलिक आदि बातों की जानकारियाँ ने पत्रों के माध्यम से अपनी सुपुत्री इंदिरा को अपने देश ही नहीं सम्पूर्ण विश्व की दी थी।

अतएव, पत्र की भाषा ऐसी होनी चाहिए मानो हम आस-पास बैठे एक-दूसरे से वर्तमान समय में पत्रों का महत्त्व घटता जा रहा है। अब सिर्फ कार्यालयों और विभिन्न परीक्षाओं तक ही यह सीमित रह गया है। कारण, टेलीफोन, मोबाईल, इंटरनेट आदि का द्रुतगति से प्रचार-प्रसार है। फिर भी, पत्र का स्थान उक्त माध्यम नहीं ले सकता।

पत्र दस्तावेज और ऐतिहासिक धरोहर होता है। इसे बहुत दिन तक संजोकर खा जा सकता है; जबकि मोबाईल की बातें या S.M.S. को सुरक्षित रखना संभव नहीं। दूसरी बात यह भी है कि पत्रों के द्वारा हम जितना जुराव महसूस करते हैं, टेलीफोन या मोबाईल से नहीं। पत्रों में हम अपनी बातों को विस्तार से कहते हैं; यह मोबाईल पर कहाँ संभव है। साधारणतः पत्रों को हम दो श्रेणियों में बाँटते हैं

1. सामाजिक पत्र : अपने सगे-संबंधियों, मित्रों को लिखा जानेवाला पत्र सामाजिक पत्र की श्रेणी में आता है। यह भी दो तरह का होता है-
(A) वैयक्तिक और (B) निमंत्रण-पत्र ।

2, व्यापारिक पत्र : प्रार्थना-पत्र, कार्यालयी पत्र तथा समाचार-पत्र के सम्पादक के नाम लिखे जानेवाले पत्र इस श्रेणी में आते हैं।

(A) वैयक्तिक : वैयक्तिक पत्रों में निम्नलिखित बातें होनी चाहिए :

1. अपना पूरा पता और तिथि : पहले अपना पूरा पता और तिथि दाहिनी और ऊपर लिखा जाता था, अब इसे बायीं ओर लिखने की परंपरा चल पड़ी है। स्मरण रहे, पहले अपना पूरा पता फिर नीचे दिनांक लिखा जाय ।

उदाहरण के रूप

बी.पी.एस. आवासीय पब्लिक स्कूल,
बी.पी.एस. नगर, नावकोठी, बेगूसराय
26 जून, 2009

नोट : तिथि में महीने का नाम अंकों में न लिखकर अक्षरों में लिखना चाहिए।

2. जिसे पत्र लिखा जा रहा है, उसका पूरा पता :

पत्र की समाप्ति पर इसे भी बायीं ओर नीचे लिखना चाहिए, क्योंकि यह स्पष्ट होना चाहिए कि पत्र कहाँ और किसे भेजा जा रहा है।

3. कार्ड या लिफाफे के ऊपर पता :

वैयक्तिक परिचयवाले का पता कार्ड या लिफाफे के ऊपर इस प्रकार लिखना चाहिए :
सुश्री अंशु अनू
C/o श्री के. एन. सिंह
मकान नं.-30, व्यास नगर कॉलोनी,
पो.-आशियाना नगर, पटना-800 025

4.प्रशस्ति और उपसंहार 

प्रशस्ति उपसंहार
1. अपने से बड़े लोगों के लिए-पूज्य,पूज्यवर, आदरणीय, पूज्या, आदरणीया, पूजनीया आदि शब्दों का प्रयोग करना
चाहिए। जैसे—पूज्य/पूज्यवर/आदरणीय पिताजी/भैया/दादाजी/चाचाजी/नानाजी माताजी,दीदी/नानीजी/मौसीजी/बुआजी/दादीजी/
1 संबंध के अनुसार लिखना चाहिए-आज्ञाकारी/प्रिय/कृपाकांक्षी स्नेहपात्र/प्यारा आपकी आज्ञाकारिणी/प्यारी/प्रिया/ इनमें पूज्या/पूजनीया/आदरणीया से कोई शब्द लिखकर नीचे अपना नाम
2. अपने से छोटों के लिए प्रिय/ प्रियवर/आयुष्मान्/आयुष्मती/चिरंजीवी/ परमप्रिया आदि शब्द लिखकर नाम लिखना चाहिए। जैसे-प्रिय  रामानुज, आयुष्मान् प्रखर,  आयुष्मती आशु, 2. तुम्हारा शुभचिन्तक/शुभाकांक्षी/हितैषी इत्यादि में से कोई शब्द लिखकर अपना संबंध लिखें और उसके नीचे अपना नाम लिखें।  जैसे-तुम्हारा शुभाकांक्षी भाई अरविन्द
3. मित्र/सहेली के लिए प्रिय/अभिन्न –  हृदय/ प्यारी आदि में से कोई  लिखकर उसका नाम लिखना चाहिए। जैसे—प्रिय विभव, प्यारी जूही, अभिन्न-हृदय विभाकर जी,

 

3. तुम्हारा अपना ही/तुम्हारी अपनी ही/  अभिन्न हृदय/आपकी प्रिय सखी/आपका प्यारा मित्र इत्यादि में से कोई लिखकर अपना नाम लिखें/ जैसे—तुम्हारा अभिन्न हृदय
कोमल गौतम
4. अध्यापकों नेताओं/किसी सम्मानित व्यक्तियों के लिए श्रद्धेय परमादरणीय /श्रद्धास्पद/परममान्य इत्यादि में से कोई  कोई लिखकर उन शब्दों को जिनको लिखा जा रहा है।  जैसे – श्रद्धेय स्वामीजी , परमादरणीय , गुरूजी आचार्यजी । 4. आपका विनीत/आपका  चरण सेवक /भवदीय/भवदीया इनमें से कोई लिखकर नीचे अपना नाम लिखें।  जैसे-आपका विनीत
संजीव भद्रा
आशुतारा
5 . प्रति के पति – पतिदेवाहदय के स्वामी आदि लिखें। प्रति—प्राणनाथ/प्रियतम 5. आपकी सेविका/भवदीया/प्राणप्रिया आपकी अर्धागिनी/हृदयवल्लभा/आपकी अपनी ही में से कोई लिखकर अपना नाम लिखें।
जैसे-आपकी हृदयवल्लभा
रंजू रानी

5. अभिवादन :

सप्रेम नमस्ते/सादर प्रणाम/चरण स्पर्श/शुभाशीर्वाद/शुभ प्यार/सप्रेम
वन्दे इत्यादि लिखने के बाद :

1. आपका/तुम्हारा प्रेम-भरा पत्र मिला/ अभी-अभी प्राप्त हुआ।
2. आपका स्नेह भरा पत्र पढ़कर बड़ी प्रसन्नता हुई।
3. चिरकाल से आपका/तुम्हारा पत्र प्राप्त नहीं हुआ।
4. आशा है, आप/तुम स्वस्थ एवं सानंद होंगे/होगे।
5. यहाँ सब प्रकार से कुशल है, आशा है, आप सब/तुम सब भी कुशलपूर्वक होंगे होगे इसके बाद पत्र के विषय पर आएँ ।

नोट : आजकल कुशल-क्षेम पूछने की परंपरा खत्म होती जी रही है। यदि ‘सकुशल’ लिखा
जाय तो उसमें ‘पूर्वक’ शब्द न जोड़ें। या तो ‘सकुशल’ लिखें अथवा ‘कुशलपूर्वक’ ।

6. पत्र का कलेवर : पत्र के कलेवर में आगे लिखी जानेवाली बातें आनी चाहिए-

1. सादगी, स्वाभाविकता, सरल भाषा, लेखक के व्यक्तित्व की झलक—ये सारे तत्त्व किसी उत्तम पत्र के गुण हैं ?
2. संकोच के भाव पत्र के कलेवर में नहीं आने चाहिए ।
3. आप जो कुछ भी कहना चाहते हैं, वह सर्वथा स्पष्ट होना चाहिए। अच्छा तो
यह है कि जो कुछ पत्र में लिखना चाहते हैं, उसकी रूपरेखा पहले से ही तैयार
कर लें । पत्र-लिखते समय यह कल्पना करें कि आप जिसे पत्र लिख रहे हैं, वह आपके समक्ष बैठा है।

(B) निमंत्रण पत्र

निमंत्रण-पत्र दो प्रकार से लिखे जाते हैं :

(i) अन्यपुरुष प्रधान निमंत्रण-पत्र और
(ii) मध्यमप

व्यसायिक पत्र | पत्र लेखन हिंदी | Patra Lekhan

1 .ऐसे पत्रों की प्रशस्ति महोदय’, ‘श्रीमान् जी’ आदि शब्दों से होती है। जिस फर्म में अधिक व्यक्तियों या सामूहिक नाम चलता है, वहाँ श्रीमन्त’ का व्यवहार होता है। सरकारी पत्रों में मान्यवर’, ‘माननीय’, ‘समादरणीय’ आदि शब्दों का प्रयोग होता है।
2. इन पत्रों के ऊपर बायी ओर पत्र पानेवाले का पता लिखा जाता है।
3. अपना पता पत्र के ऊपर बायी ओर लिखा जाता है।
4. समाप्तिसूचक शब्द व्यापारिक पत्रों में ‘भवदीय’ या ‘भवदीया’ आदि बायीं ओर नीचे लिखा जाता है।
5. सभ्यता के लिए ‘अनुगृहीत’, ‘कृतार्थ आदि शब्दों का प्रयोग किया जाता है।

जैसे—’पत्र का उत्तर देकर अनुगृहीत करें।
‘पत्र का उत्तर देकर मुझे कृतार्थ करें।

एक उदाहरण देखे
बंसल इंस्टीच्यूट, कोटा, राजस्थान

सेवा में ,                                                                                                                                          
श्रीमान् व्यस्थापक महोदय ,
विशाल मेगा मार्ट नई दिल्ली -81

मान्य महानुभाव,

हमारे इंस्टीच्यूट के बिजनेस मैनेजमेंट के छात्र तथा अध्यापक गण आपके व्यापारिक प्रतिष्ठान देखकर अपना सामान्य ज्ञान बढ़ाना चाहते हैं। आशा है, इसमें आपको कोई आपत्ति नहीं होगी; बल्कि प्रसन्नता ही होगी। कृपया, सूचित करें कि क्या हम आगामी 30 अगस्त, 2009 रविवार को दोपहर 12 बजे तक आपके व्यापारिक प्रतिष्ठान को देखने के लिए आ सकते हैं ? पूर्ववत् कृपा बनाए रहें।

भवदी

डॉ. मंगलमूर्ति सान्याल
बंधक बंसल इंस्टीच्यूट

नौकरी के लिए प्रार्थना पत्र लिखते समय निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान देन

1. पत्रारंभ में इस बात का पता देना चाहिए कि क्या लेखक किसी विज्ञापन के उत्तर में प्रार्थना पत्र दे रहा है या अपनी ओर से लिख रहा है |
2. पत्र लिखने के बाद अपना बायोडाटा जिसमें अपना नाम, माता-पिता के नाम, जन्म तिथि शै क्षिक अनुभव स्थायी पता मोबाइल नम्बर आदि लिखना चाहिए ।

एक उदाहरण देखें-

गणित के शिक्षक पद पर नियुक्ति हेतु प्राचार्य के पास लिखा गया प्रार्थना पत्र

सुजानपुर तीरा,
लक्ष्मी हाउस -सी0/14,
हिमाचल प्रदेश,
18 दिसम्बर, 2011

सेवा में,
श्रीमान् प्राचार्य महोदय,
बी.पी.एस. पब्लिक स्कूल,
आशियानानगर पटना-25

विषय : गणित शिक्षक-पद पर नियुक्ति हेतु ।

महाशय,
15 दिसम्बर, 2011 के दैनिक हिन्दुस्तान टाइम्स के द्वारा ज्ञात हुआ कि आपके स्कूल में एक प्रशिक्षित गणित अध्यापक की आवश्यकता है, जो योग्यता में कम-से-कम द्वितीय श्रेणी में एम.एस सी हो । मैं इसके लिए अपने को एक सुयोग्य उम्मीदवार मानता हूँ। मैं समझता हूँ कि यदि मुझे सेवा का अवसर प्रदान किया गया तो मैं अपने कार्यों व अनुभवों से छात्र-छात्राओं एवं अधिकारी-वर्ग को यथासंभव संतुष्ट करने का यत्न करूँगा। आशाजनक उत्तर की प्रतीक्षा करते हुए।

आपका कृपाभिलाषी
अम्बुज गौतम

बायोडाटा

अम्बुज गौतम

1. आवेदक:अम्बुज गौतम
2. पिता का नाम:श्री अमलेश कुमार
3. माता का नाम:श्रीमती विभा देवी
4. जन्म-तिथि:14 अगस्त, 1988
5. लिंग:पुरुष
6. राष्ट्रीयता एवं कोटि :भारतीय/सामान्य
7. स्थायी पता:सुजानपुर तीरा
8 . वर्तमान पता
9. शैक्षणिक योग्यता|: मैट्रिक
10. अन्य योग्यता:अभिनय एवं चित्रकारिता
टेलीफोन नं.-0296-554048
मोबाईल. नं.-9934284818

11. सम्पर्क सूत्र:
अभिनय एवं चित्रकारिता
टेलीफोन नं.-0296-554048
मोबाईल. नं.-9934284818

12. अनुलग्नक (i) मैट्रिक से बी. एड. तक के प्रमाण-पत्रों की छाया प्रतियाँ
(ii) अभिनय एवं चित्र-प्रतियोगिता प्रमाण-पत्र की छाया

समाचार-पत्रों को पत्र
समाचार-पत्रों में जब कोई पत्र प्रकाशित करवाना हो अथवा समाचार-पत्र संबंधी कोई पत्र-व्यवहर करना हो तो इसके लिए सम्पादक को ही संबोधित करना चाहिए। समाप्ति के समय ‘भवदीय/भवदीया’ लिखकर नीचे अपना नाम देना चाहिए। प्रशस्ति के लिए ‘महोदय’ या ‘महानुभाव’ लिखना चाहिए। अपना पता अवश्य लिखना चाहिए।

एक उदाहरण
व्यासनगर ‘बी’ मकान नं.-30
आशियाना पटना-25
25 जून, 2009

सेवा में,
सम्पादक महोदय,
प्रभात खबर, राँची

महोदय,

कृपया, अपने समाचार-पत्र में माओवादियों द्वारा चलाए गए आन्दोलन के विषय में मेरे विचार को प्रकाशित करके उन्हें पाठकों तक पहुँचाने में सहयोग करें। इसके लिए में आपका चिर ऋणी रहूँगा।

भवदीय
सुनील कुमार सिन्हा
माओवादी आन्दोलन और जन-जीवन पर प्रभाव

 

विभिन्न प्रकार के पत्रों के आदर्श-नमूने
1. बटुकेश्वर दत्त को लिखा पत्र भगत सिंह की ओर से

सेंट्रल जेल, लाहौर
अक्टूटर, 1930
प्रिय भाई,

मुझे दंड सुना दिया गया है और फाँसी का आदेश हआ है। इन कोठरियों में मेरे कि किसी तरह फाँसी से बच जाएँ; परन्तु उनके बीच शायद मैं ही एक ऐसा आदमी हूँ, अतिरिक्त फाँसी की प्रतीक्षा करनेवाले बहुत-से अपराधी हैं। ये लोग प्रार्थना कर रहे हैं जो बड़ी बेताबी से उस दिन का इन्तजार कर रहा हूँ, जब मुझे अपने आदर्श के लिए फाँसी के फंदे पर झूलने का सौभाग्य प्राप्त होगा। मैं इस खुशी के साथ फाँसी के तख्ते पर चढ़कर दुनिया को दिखा दूंगा कि क्रांतिकारी अपने आदर्शों के लिए कितनी वीरता से बलिदान कर सकते हैं। मुझे फाँसी का दंड मिला है। किन्तु तुम्हे आजीवन कारावास का दंड मिला है।

जीवित रहोगे और तुम्हें जीवित रहकर यह दिखाना है कि क्रांतिकारी अपनी आदी के लिए केवल मर ही नहीं सकते; बल्कि जीवित रहकर मुसीबतों का मुकाबला भी कर क्रांतिकारी संयोगवश फाँसी के फंदे से बच गए हैं, उन्हें जीवित रहकर दुनिया को यह सकते हैं। मृत्यु सांसारिक कठिनाइयों से मुक्ति का साधन नहीं बननी चाहिए, बल्कि जो दिखा देना चाहिए कि वे न केवल अपने आदर्शों के लिए फाँसी पर चढ़ सकते है वरन् जेल की अंधकारपूर्ण छोटी कोठरियों में घुल-घुलकर निकृष्टतम दरजे के अत्याचारों को भी सहन कर सकते हैं …..

 तुम्हारा
भगत सिंह

नोट : उस समय की परंपरा के अनुसार इस पत्र का प्रारूप है, वर्तमान प्रारूप परिवर्तित है जिसका जिक्र किया जा चुका है।

2. छोटे भाई को पढ़ाई लिखाई के संबंध में पत्र
कौशल्या छात्रावास
बी.पी.एस. नगर इलाहाबाद
25 नवंबर, 2009

प्रिय अनुज,
प्रसन्न रहो।

तुम्हरा पिछला पत्र मुझे यथासमय मिल गया था; किन्तु अतिव्यस्तता के कारण मैं इसके पूर्व उत्तर न दे सका। विश्वास है, बुरा नहीं मानोगे। इधर मुझे पिताजी का एक पत्र मिला है, जिससे मैं अत्यधिक चिंतित हो गया हूँ।

पिताजी को अपने एक मित्र से पता चला है कि तुम अच्छी तरह से पढ़ाई-लिखाई नहीं कर रहे हो। अपना अधिकतर समय गपशप, सिनेमा, पिकनिक तथा शतरंज खेलने में व्यतीत करते हो। तुम्हें पता है कि पिताजी अपना खून-पसीना एक कर हमारे लिए साधन एकत्र करते हैं।

ऐसी स्थिति में यदि हमलोग उनके परिश्रम से प्राप्त धन का तथा अपने समय का सदुपयोग नहीं करते हैं तो यह उनके प्रति घोर अन्याय होगा। सिनेमा जाना, बातचीत करना या शतरंज खेलना बुरा नहीं है, किन्तु हर काम की अपनी सीमा होती है। और फिर यह समय तो अधिकाधिक अध्ययन का है। तेरी परीक्षा भी निकट है।

ऐसी स्थिति में इस समय तुम्हें अपना समय  सदुपयोग नहीं करते है तो फिर यह समय तो अधिकाधिक अध्ययन का है। तेरी परीक्षा भी निकट है। ऐसी स्थिति करना या शतरंज खेलना बुरा नहीं है।

किन्तु हर काम की अपनी सीमा होती है। और भविष्य में तुम्हारे बारे में ऐसी बात सुनने को नहीं मिलगी और तुम परिश्रम से पढ़कर अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होगे।  पत्र का उत्तर देना। पिताजी को भी एक पत्र डाल देना।

 तुम्हारा अग्रज

भानुप्रताप
डाक टिकट
आयुष्मान् अनुज प्रताप
कमरा नं. 49, जैन छात्रावास
करनेलगंज, इलाहाबाद (उ. प्र.)

3.मित्र को शिमला-भ्रमण के संबंध में पत्र

अजमेरशरीफ
आबू रोड, राजस्थान
5 मई, 2010

प्रिय अनिल,
सप्रेम वन्दे

बहुत दिनों से तुम्हारा कोई पत्र नहीं मिला। तुम तो कभी-कभी ऐसी चुप्पी साध जाते हो कि कुछ पता ही नहीं चलता। तुम्हें याद होगा, पिछले वर्ष जब हमलोग सिक्किम चूमने गए थे तो यह तय हुआ था कि अगले ग्रीष्मावकाश में शिमला घूमने चलेंगे। अब समय नजदीक आ गया है। अतः, पुनः कार्यक्रम बन जाना चाहिए।

मनटुन का पत्र आया था। वह अपने एक मित्र की सहायता से शिमला भ्रमण की रूपरेखा बना रहा है । मैं शीध्र ही वह कार्यक्रम तुम्हारे पास भेजूंगा।
हाँ, इस बार का सारा व्यय मैं ही वहन करूँगा, तुम्हें इसकी चिंता करने की जरूरत नहीं है। मेरा यह निश्चय तुम्हें मानना ही होगा। एक आग्रह और, तुम इसे ऋणशोध का प्रयत्न न मान बैठना। अरे यार, तुम मेरे इतने अभिन्न हो कि मुझे विश्वास है कि मेरी बात को तुम कभी अन्यथा नहीं लोगे। आशा है, गिटार का अभ्यास यथापूर्व चल रहा होगा । उसे भी साथ ले चलना । झीलों के किनारे गिटार की सुरलहरी हमारे मनोरंजन में चार चाँद लगाएगी।

 पत्रोत्तर की प्रतीक्षा में
तुम्हारा अजीज
नदीम आफजाल

डाक टिकट
सेवा में,
श्री अनिल कुमार बजाज
बसंत विहार कॉलोनी
रोड नं. – 27, मकान नं.-2 बी/30
अलीगढ़, उ. प्र

4. पिता को पत्र अपनी परीक्षा की तैयारी के संबंध में,

टैगोर आवास
धरमतल्ला रोड, कोलकाता-4
21 दिसंबर, 2009

पूज्यवर पिताजी,
सादर चरण-स्पर्श
आपका प्यार भरा पत्र मिला। पत्र पढ़कर दिल बाग-बाग हो गया। माताजी स्वास्थ्य लाभ कर रही है यह जानकर हार्दिक प्रसन्नता हुई। 25 दिसंबर से 5जनवरी तक कॉलेज में अवकाश है। बहुत दिनों के बाद पुनः हमलोग एक साथ होंगे। इसकी कल्पना मात्र से मैं रोमांचित हो जाती हूँ।
जहाँ तक मेरी विश्वविद्यालयी परीक्षा की तैयारी की बात है, वह मेरी दृष्टि में बहुत ही अच्छी है। मैंने सारे पेपर भली-भाँति तैयार कर लिए हैं। पिछली टर्मिनल परीक्षा में मात्र दो नंबर के कारण मैं महाविद्यालय टॉपर नहीं हो सकी। इस बार मैंने तैयारी जमकर की है। आपके कथनानुसार मैंने कॉलेज टाईम के बाद के समय की रुटिन बना ली है। सुबह में भी तीन बजे से साढ़े छह तक स्टडी करती हूँ। फिर कोचिंग के बाद लगभग चार घंटे पढ़ती हूँ। पता है, पिताजी, इस बार की मासिक परीक्षा में तो मुझे प्रिंसिपल साहब ने डबल स्टार दिए हैं। मेरी उत्तर पुस्तिका में कहीं भी लाल निशान नहीं है। आप निश्चित रहें। इस बार आपकी लाडली अपने माता-पिता और विश्वविद्यालय का नाम रोशन करेगी।

शेष समाचार पूर्ववत् है। इधर मेरी सहेली पूजा चक्रवर्ती की माँ बहुत ज्यादा अस्वस्थ हो गई हैं। कभी-कभी तो पूजा उदास हो जाया करती है। पिछले साल उसी को सर्वश्रेष्ठ छात्रा का पुरस्कार मिला था। आपके और माताजी के स्वास्थ्य की कामना करते हुए पत्र
समाप्त करती हूँ।
आपकी लाडली
अंशु अन

डाक टिकट
सेवा में,
डॉ. ए. कुमार
प्राचार्य बी.पी.एस.
ग्रा. + पो.-नावकोठी
जिला-बेगूसराय

5  . माताजी के देहान्त पर मित्र को शोक-पत्र

अपराजिता अपार्टमेंट कमरा नं.-201
रोड नं.-32, बड़ा बाजार, कोलकाता
26 जून, 2009

प्रिय माहेश्वरी
नमस्ते।

आज ही तेरा शोक-भरा पत्र प्राप्त हुआ। माताजी के देहान्त की बात पढ़कर मैं सन्न रह गया। उनकी अस्वस्थता से तो मैं अवगत था; किन्तु इतनी जल्दी वे हमलोगों को छोड़ जाएँगी, ऐसा कभी नहीं सोचा था। इस खबर को सुनकर तो तेरी चाची भी बहुत रोयी।
मेरे अजीज, भला होनी को कौन टाल सकता है ? इस दुःख घड़ी में तुम धैर्य खोना; क्योंकि ऐसे समय ही इन्सान की असली परीक्षा होती है। नियति के इस दंड को तुम्हें स्वीकारना होगा। यह तो प्रकृति का नियम ही है । देखो, गोस्वमीजी ने रामचरितमानस में क्या लिखा है-
“आए हैं सो जाएँगे, राजा रंक, फकीर ।
एक सिंहासन चढ़ी चले, एक बँधै जंजीर ।।”
मेरे दोस्त, आदि और अन्त सब कुछ भाग्य के हाथ हैं। तुम इस सच्चाई को समझो और कलेजे पर पत्थर रख अपने कामों में लगो। ईश्वर करे, माताजी की दिवंगत आर मा को चिरशांति मिले । विपत्ति की इस घड़ी में मैं स्वयं आकर तेरा दुःख बाँ-गा। कुछ अत्यावश्यक कार्यों से निवटकर मैं अगले सप्ताह आ रहा हूँ। शेष मिलने पर ।
तुम्हारा मित्र
वासुदेव सोलंकी

डाक टिकट
श्री माहेश्वरी नौटियाल
C/o, श्री दुर्गेश्वरी नौटियाल
-155
टैगोर रोड हावड़ा -26 (प. बंगाल)

6 . बहन के विवाह समारोह में सम्मिलित होने के लिए मित्र को पत्र

शान्ति कुंज रोड, हरिद्वार
(उत्तराखंड)
24 अप्रैल, 2010

प्रिय सरोवर,
नमस्ते।
बहुत दिनों से तुम्हारे पत्र न मिलने से मैं बहुत दुखी हूँ। आशा है, तुम स्वस्थ एवं तुम्हें यह जानकर बेहद प्रसन्नता होगी कि बड़ी जद्दोजहद के बाद अगले महीने सानंद होंगे ।
की 16 तारीख को मेरी बहन सोनी की शादी तय हो गई है। विवाह का औपचारिक निमंत्रण-पत्र अभी तक नहीं छप सका है। आते ही तुम्हें भेजा जाएगा; किन्तु मैं तुम्हें इस समारोह में उपस्थित होने के लिए विशेष रूप से निमंत्रित कर रहा हूँ। तुम 10 मई तक निश्चित रूप से आ जाओ। विवाह की पूर्व तैयारी करने में तेरी उपस्थिति बहुत जरूरी है।

शेष बातें आने पर होंगी। हाँ, अपने साथ गुड़िया और बिटू को अवश्य लेते आना। चाचाजी को मेरा सादर नमन कहना। तुम्हारी प्रतीक्षा में,
तुम्हारा मित्र
सीताराम शरण

डाक टिकट
सेवा में,
श्री सरोवर प्र. लाल
कस्तूरी एपार्टमेंट
शुक्ला कॉलोनी, हीनू, राँची-2

7 . जलवायु परिवर्तन के लिए गई हुई सखी का पत्र ।

मकान नं.-3440
पहाड़गंज, ऊटी
12 जून, 2010

मेरी प्यारी सखी राजलक्ष्मी,
तुम सदा मेरे लिए शुभकामनाएँ भेजती और मेरे स्वास्थ्य के विषय में पूछती रही हो। इसके लिए यदि मैं तुम्हें धन्यवाद दूँ तो वह बनावटीपन होगा। प्यारी सखी, जब से मैं यहाँ आई हूँ, मुझे तुम-सी विनोदी और सहृदय सखी कोई नहीं मिली। यहाँ की जलवायु मेरे लिए सर्वथा अनुकूल है। इस जगह पर न तो गर्मी
है, और न ही गया-सा शोर । पिताजी ने एक कमरा किराये पर ले लिया था। इस समयमाताजी मेरे साथ हैं। पिताजी तो दो दिन ही यहाँ ठहरे फिर कोलकाता चले गए। प्रतिदिन के हिसाब से कमरे का हम 60 रुपये किराया दे रहे हैं। यहाँ हर प्रकार की सुविधा है। खाने-पीने की वस्तुएँ सुलभ हैं। यहाँ आए हमें लगभग बारह दिन हो गए हैं। इन थोड़े ही दिनों में मैं अपने शरीर में विशेष ताजगी महसूस कर रही हूँ। मैं अब पहले से ज्यादा स्वस्थ हूँ। तुम्हें इस बात से आश्चर्य होगा कि इन दिनों मेरा वजन दो किलोग्राम बढ गया है।
तुम्हारे घर की मिसी कितनी भोली और प्यारी थी। उसका खेल मन को मुग्ध कर देता था। बस, उसी तरह यहाँ भी दो खरगोश हैं। वे भी बड़े प्यारे और भोले हैं। उनके खेल- कूद मन को मोह लेते हैं; किन्तु तेरी याद सताती रहती है। पत्र द्वारा अपना समाचार लिखना। हमारे जीजाजी कैसे हैं? आजकल उनकी तैयारी कैसी चल रही है ? मेरी ओर से अपनी माताजी को नमस्ते कहना और बाकी सखियों को भी बहुत बहुत प्यार । पत्र लिखती रहना।

तुम्हारी प्रिय सखी,
वर्षा रानी

डाक टिकट
राजलक्ष्मी मिश्रा
पचमहला टोला, मंगेरीगंज
गया (बिहार), पिन-828488

8 . गली-मुहल्ले में पड़ी गंदगी के बारे में स्वास्थ्य अधिकारी के नाम पत्र। 

सी./27, पश्चिमी पटेलनगर
अहमदाबाद, गुजरात
27 जुलाई, 2010

सेवा
श्रीयुत स्वास्थ्य अधिकारी महोदय,
अहमदाबाद नगर निगम, अहमदाबाद
मान्यवर,
मैं आपका ध्यान अपने मुहल्ले की दुर्दशा की ओर आकृष्ट करके आपसे प्रार्थना करना चाहती हूँ, जिससे आप उचित व्यवस्था कर सकें और यहाँ के निवासियों का स्वास्थ्य सुधार सके?
इस मुहल्ले के चौराहे पर जो कूड़ेदान पड़ा है, वह एक तो सदा खुला रहता है; दूसरे कई कई दिन तक उसमें कूड़ा पड़ा रहता है। मक्खियाँ भिन-भिन करती रहती हैं और दुर्गंध इतनी कि नाक नहीं रखी जाती । बाहर भी कचरों का अंबार लगा रहता है। नालियों की भी वैसी ही स्थिति है। इधर सूअर आ-आकर और भी अधिक गंदगी फैला जाते हैं; जिनसे यहाँ रहनेवालों का जीना मुहाल हो गया है।

मच्छरों का प्रकोप तो इतना है कि केवल इस मुहल्ले में लगभग 70 व्यक्ति मलेरिया से पीड़ित हैं। इधर इनफ्लुएन्जा के रोगी भी देखे गए हैं। वर्षा ऋतु होने से हैजा आदि का भी डर बना हुआ है। इन्हीं कारणों से मेरी आपसे विनम्र प्रार्थना है कि आप इस विषय में नगर निगम के कर्मचारियों की जाँच-पड़ताल करें और इस दुर्गंधमय कूड़े-कचरे को उठवाने तथा ब्लीचिंग पावडर छिड़कवाने का शीघ्र प्रबंध करें। इस कूड़ेदान के ढक्कन की व्यवस्था भी अपेक्षित है। इस कष्ट के लिए मैं और मुहल्लेवासी सदा आपका ऋणी रहेंगे।

धन्यवाद ।
भवदीया
हनी एवं सभी मोहल्लेवासी

 9 . विद्यालय के शिक्षक जो उच्च पद ग्रहण करने जा रहे हैं के लिए विदाई पत्र ।

सैनिक स्कूल, बालाचडी
24 मार्च, 2011

सेवा में,
श्रीमान् रामशंकर जी,
गणित-विभाग
सैनिक स्कूल, बालाचडी, गुजरात
मान्यवर,
हम दशम कक्षा के विद्यार्थी, प्रेम, श्रद्धा और कृतज्ञता के भावों से परिपूर्ण हो आपको विदाई देने के लिए यहाँ एकत्रित है?
जिस दिन से शिक्षा प्राप्त करने के लिए हम आपके चरणों में आए हैं, उसी दिन से आपकी हमपर कृपा दृष्टि बनी रही है। आपके शिक्षा दान में एक विशेष प्रकार का आकर्षण रहा था, क्योंकि वह पूर्ण विद्वत्ता, गंभीर अध्ययन तथा महान् अनुभव का परिचायक था। आपका धाराप्रवाह व्याख्यान, चमत्कारपूर्ण शैली तथा किसी विषय की व्याख्या करने की परिपार्टी जड़बुद्धियों में भी चेतना का संचार कर देती थी और सभी मंत्रमुग्ध हो जाते थे।

आपने हमारे हृदयों में केवल गणित के प्रति ही प्रवृत्ति जाग्रत नहीं की; अपितु आपने हमें चरित्र के महान् आदर्शों को प्राप्त करने की भी प्रेरणा दी। आपने हमें सिखाया कि सत्य, दया और संघर्षरत रहने का क्या महत्त्व है और हमें अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए किस तरह दृढ़ रहना चाहिए |

गुरुदेव, आपका जीवन सात्विक, उद्यमशील तथा कर्त्तव्यपरायण रहा है। आपका कथन आज भी हमें प्रेरित करता है-
“तुम सब भारत के भावी सपूत हो। अपने कर्त्तव्यों से देश की शान बढ़ाओगे और ऐतिहासिक पुरुष बन जाओगे। हमेशा इस बात की याद रखना कि तुम्हारे परिवार समाज, देश और इस पूरे विश्व को तुमलोगों से बड़ी अपेक्षाएँ हैं। ।”

आपका प्रभाव कक्षा भवन तक, जहाँ पर हमारे लिए एक मित्र, एक दार्शनिक और एक  मार्गदर्शक थे, ही सीमित नहीं था; अपितु खेल के मैदान खिलाड़ी थे। आपके कीड़ा चातुर्य तथा मनोविनोदी स्वभाव को देखकर हम खेलों में सहनशीलता और अनुशासन के महत्त्व को समझ सके थे। हमें हर्ष और विषाद दोनों हो रहे हैं। विषाद इस बात से कि ऐसे श्रेष्ठ, गुणी, कर्तव्यनिष्ठ और सदाचारी अध्यापक हमसे जुदा हो रहे हैं और हर्ष इस बात से आपकी योग्यता, विद्वत्ता और विषय की अच्छी पकड़वाले अध्यापक को देर से ही सही किन्तु सरकार ने महत्त्व तो दिया। हमें तो लगता है कि आपको इससे भी ऊँची जगह मिलनी चाहिए। आज हम सारे छात्र आँखों में अश्रु और होठों पर मुसकान लिए आपको में विदा कर रहे हैं।

महाशय, हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि जो कृपादृष्टि, सहानुभूति और प्रेम आपका हमारे प्रति रहा, उसे हम कभी नहीं भूलेंगे और आपकी बातों को गाँठ बाँधते हुए अपनी मंजिल को प्राप्त करेंगे। आप जिस नये कार्य के लिए जा रहे हैं, हमारी कामना कि आप शीघ्र ही उसे ऊँचाई को प्राप्त करें जहाँ हर किसी की पहुँच नहीं हो पाती है।

हम हैं आपके कृतज्ञ शिष्य
दशम वर्ग के विद्यार्थी

10 . प्राचार्य को प्रार्थना पत्र विलम्ब शुल्क माफ करने के संबंध में।

11 दिसंबार, 2012

सेवा में,
प्राचार्य महोदय,
डी.ए.वी. पब्लिक स्कूल, आर.के.10 पुरम ।
विषय : विलम्ब शुल्क माफ कराने हेतु ।
महाशय,
सविनय निवेदन है कि मैं आपके विद्यालय की दसवीं कक्षा की छात्रा हूँ। पिछले सप्ताह मेरे दादाजी सख्त बीमार थे जिसके कारण पूरा परिवार आर्थिक संकट में रहा । इस आर्थिक संकट की वजह से मैं विद्यालय का मासिक शुल्क समय पर अदा न कर पायी । अतः, आपसे सादर निवेदन है कि मेरा विलम्ब-शुल्क दंड माफ कर दिया जाय और बिना दंड के शिक्षण शुल्क जमा करने की अनुमति दी जाय। आशा है, आप मेरे प्रार्थना-पत्र पर सहानुभूतिपूर्वक विचारकर मुझे अनुगृहीत करेंगे।

धन्यवाद !
आपकी आज्ञाकारिणी छात्रा
नीलिमा
कक्षा-दशम, सेक्सन–बी
क्रमांक-18

11  स्थानांतरण प्रमाण-पत्र एवं चरित्र प्रमाण-पत्र हेतु प्रार्थना पत्र ।

12 जुलाई, 2009
सेवा में,
प्राचार्य महोदय,
सेंट पॉल सीनियर सेकेण्डरी, जयपुर
द्वारा: वर्ग शिक्षक महोदय,
विषय : स्थानांतरण एवं चरित्र प्रमाण पत्र हेतु ।
महाशय,
मेरे भैया भी आई. आई. टी. में सफल हुए और संयोगवश उनका नामांकन भी आई. सविनय निवेदन है कि मेरे पिताजी का ट्रांसफर (स्थानांतरण) मुम्बई हो गया है। आई.टी. कॉलेज पुणे में होना है। हम सपरिवार मुम्बई जा रहे हैं। इस कारण से मुझे पढ़ाई जारी रखने के लिए स्थानांतरण एवं चरित्र-प्रमाण-पत्रों की आवश्यकता है।
अतः, श्रीमान् से नम्र निवेदन है की उक्त प्रमाण पत्र निर्गत कर परम यश का भागी बने ।
आपकी आज्ञाकारी शिष्य
नीनाबाई साराभाई संकेत
कक्षा-अष्टम ‘ब’
क्रमांक-04
12 . आपके स्कूल में खेल-कूद की व्यवस्था संतोषजनक नहीं है। इसकी सुन्दर व्यवस्था के लिए आग्रह करते हुए अपने प्राचार्य के पास प्रार्थना पत्र लिखें।

25 सितंबर, 2010

सेवा में,
श्रीमान् प्राचार्य महोदय,
डॉन बास्को एकेडमी, पानीपत।
विषय : खेल-खूद की व्यवस्था में अपेक्षित सुधार हेतु।
महाशय,

सविनय निवेदन है कि हमारे विद्यालय में न तो खेल कूद की पर्याप्त सामग्री है, न ही अच्छे गाइड । छात्र छात्राओं की संख्या के अनुपात में सामग्री बहुत ही कम है। सीनियर छात्र-छात्रा ही गाइड का भी काम करते हैं जो काफी नहीं है। चूंकि उन्हें भी खेलों के नियमों की अद्यतन जानकारी नहीं है इसलिए पिछले महीने हुए क्रिकेट टूर्नामेंट में और वॉलीबॉल प्रतियोगिता में हमारी टीमों की करारी हार हो गई। अतः, श्रीमान् से सादर निवेदन है कि खेल कूद की सामग्रियों में वृद्धि एवं एक खेल-शिक्षक या अच्छे प्रशिक्षक की व्यवस्था कर विद्यालयी टीम को सशक्त करने में उल्लेखनीय भूमिका निभाएँ। इस कार्य के लिए हम सारे छात्र-छात्राएँ आपका आभारी रहेंगे।
धन्यवाद!
भवदीय
आदर्श राज
कप्तान सीनियर क्रिकेट टीम
दशम-‘अ’

13 . मनिऑर्डर गुम होने के संबंध में पोस्टमास्टर को पत्र ।

19 अक्टूबर, 2012

सेवा में,
पोस्टमास्टर महोदय,
प्रधान डाकघर, औरंगाबाद ।
विषय : मनिऑर्डर गुम होने के संबंध में।
महाशय,

पिछले माह की 14 तारीख को मैंने दादाजी को प्रधान डाकघर औरंगाबाद से 500 रु. मनिऑर्डर भेजा था। एक माह से ज्यादा हो रहे हैं; किन्तु अभी तक उन्हें मनिऑर्डर नहीं मिल पाया है। मुझे लगता है कि डाक विभाग की अकमयॆयता के कारण ऐसा हुआ है। ऐसी स्थिति में लोगों का विश्वास डाक सेवा से उठ जाता है। उन्हें रुपयों की सख्त जरूरत थी। अतः, इसकी पड़ताल अवश्य करें। उपर्युक्त मनिऑर्डर से संबंधित जानकारी इस प्रकार है ।

  •  दाउत बिगहा, कुम्हरार
  •  कंकड़बाग, पटना-10
  •  रसीद सं.-3242
  •  दिनांक: 14 सितम्बर, 2012
  •   राशि-500 रुपये

आशा है, आप मानिऑर्डर की समस्त राशि उपर्युक्त पते पर अविलम्ब भेजकर मुझे कृतार्थ करेंगे।
धन्यवाद !
भवदीय
रामखेलावन शुक्ल
एम./248, बालाचडी
अहमदाबाद-17

 15 . चेचक के टीके के लिए हेल्थ ऑफिस को पत्र ।

दानापुर,
17 जुलाई, 2009

सेवा में,
श्रीमान् हेल्थ ऑफिसर,
दानापुर।
विषय : चेचक के टीके की व्यवस्था हेतु

महोदय,

शायद, आपको ज्ञात हो कि दानापुर अनुमंडल के पश्चिमी भाग में इन दिनों चेचक का प्रकोप जोरों पर है। बिहटा में लगभग 40 बच्चों की इससे मृत्यु हो चुकी और तकरीबन 10 लोगों की आँखें जाती रहीं। कृपया, इस क्षेत्र में शीघ्रातिशीघ्र चेचक का टीका लगवाने का प्रबंध करें।
भवदीय
राणाजी बजाज
वार्ड सदस्य,
वार्ड नं.-16

 

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