कारक क्या है ? परिभाषा भेद उदहारण सहित

कारक क्या है ? परिभाषा भेद उदहारण सहित

“जो क्रिया की उत्पत्ति में सहायक हो या जो किसी शब्द का क्रिया से संबंध बताए वह
‘कारक’ है।”

जैसे—माइकल जैक्सन ने पॉप संगीत को काफी ऊँचाई पर पहुँचाया।

यहाँ ‘पहुँचाना’ क्रिया का अन्य पदों माइकल जैक्सन, पॉप संगीत, ऊँचाई आदि से संबंध है | वाक्य में ‘ने’, ‘को’ और ‘पर’ का भी प्रयोग हुआ है। इसे कारक-चिह्न या परसर्ग या विभक्ति-चिह्न कहते हैं। यानी वाक्य में कारकीय संबंधों को बतानेवाले चिह्नों को कारक-चिह्न अथवा परसर्ग कहते हैं।

हिन्दी में कहीं कहीं कारकीय चिह्न लुप्त रहते हैं।

जैसे-

घोड़ा दौड़ रहा था।
वह पुस्तक पढ़ता है। आदि।

यहाँ ‘घोड़े’ ‘वह’ और ‘पुस्तक’ के साथ कारक-चिह्न नहीं है। ऐसे स्थलों पर शून्य चिह्न माना जाता है। यदि ऐसा लिखा जाय : घोड़ा ने दौड़ रहा था। उसने (वह + ने) पुस्तक को पढ़ता है।

तो वाक्य अशुद्ध हो जाएँगे; क्योंकि प्रथम वाक्य की क्रिया अपूर्ण भूत की है। अपूर्णभूतमें ‘कर्ता’ के साथ ने चिह्न वर्जित है। दूसरे वाक्य में क्रिया वर्तमान काल की है। इसमें भी कर्ता के साथ ने चिह्न नहीं आएगा। अब यदि ‘वह पुस्तक को पढ़ता है’ और ‘वह पुस्तक पढ़ता है’ में तुलना करें तो स्पष्टतया लगता है कि प्रथम वाक्य में ‘को’ का प्रयोग अतिरिक्त या निरर्थक हैं; क्योंकि वगैर ‘को’ के भी वाक्य वही अर्थ देता है। हाँ, कहीं-कहीं ‘को’ के प्रयोग करने से अर्थ बदल जाया करता है।

जैसे-

वह कुत्ता मारता है : जान से मारना
वह कुत्ते को मारता है : पीटना

हिन्दी भाषा में कारकों की कुल संख्या आठ मानी गई है, जो निम्नलिखित हैं-

कारक                                                                   परसर्ग/विभक्ति

  • 1. कर्ता कारक                                                      शून्य, ने (को, से, द्वारा)
  • 2. कर्म कारक                                                      शून्य, को
  • 3. करण कारक                                                    से, द्वारा (साधन या माध्यम)
  • 4. सम्प्रदान कारक                                               को, के लिए
  • 5. अपादान कारक                                                से (अलग होने का बोध)
  • 6. संबंध कारक                                                     का-के-की, ना-ने-नी; रा-रे-री
  • 7. अधिकरण कारक                                              में, पर
  • 8. संबोधन कारक                                                 हे, हो, अरे, अजी,……

 कर्ता कारक
“जो क्रिया का सम्पादन करे, ‘कर्ता कारक’ कहलाता है।”

अर्थात् कर्ता कारक क्रिया (काम) करता है।

जैसे-

आतंकवादियों ने पूरे विश्व में आतंक मचा रखा है।

इस वाक्य में ‘आतंक मचाना’ क्रिया है, जिसका सम्पादक ‘आतंकवादी’ है यानी कर्ता  कारक ‘आतंकवादी’ है।
कर्ता कारक का परसर्ग ‘शून्य’ और ‘ने’ है। जहाँ ‘ने’ चिह्न लुप्त रहता है, वहाँ कर्ता का    शून्य चिह्न माना जाता है।

जैसे—

पेड़-पौधे हमें ऑक्सीजन देते हैं।
यहाँ पेड़-पौधे में ‘शून्य चिह्न’ है।
कर्ता कारक में ‘शून्य’ और ‘ने’ के अलावा ‘को’ और से/द्वारा चिह्न भी लगया जाता है।

जैसे-

उनको पढ़ना चाहिए।  उनसे पढ़ा जाता है। उनके द्वारा पढ़ा जाता है।

कर्ता के ‘ने’ चिह्न का प्रयोग :

सकर्मक क्रिया रहने पर सामान्य भूत, आसन्न भूत, पूर्णभूत, संदिग्ध भूत एवं हेतुहेतुमद्   भूत में कर्ता के आगे ‘ने’ चिह्न आता है।

जैसे-

मैंने तो आपको कभी गैर नहीं माना ।                                            (सामान्य भूत)
मैंने तो आपको कभी गैर नहीं माना है।                                        (आ० भूत)
मैंने तो आपको कभी गैर नहीं माना था।                                         (पूर्ण भूत)
मैंने तो आपको कभी गैर नहीं माना होगा।                                   (सं०भूत)
मैंने तो आपको कभी गैर नहीं माना होता।                                  (हेतु… भूत)

क्रिया पर कर्ता के चिह्नों का प्रभाव :

1चिह्न-रहित (‘ने’ चिह्न-रहित) कर्त्ता की क्रिया का रूप कर्ता के लिंग-वचन के अनुसारहोता है।

जैसे-

उड़ान भरता एक वायुयान नीचे गिर गया था।
आज भी सुपुत्र माता पिता की सेवा को अपना कर्त्तव्य मानते हैं।

2. यदि अंतिम कर्ता एकवचन हो तो क्रिया एकवचन और बहुवचन दोनों होती है ।

जैसे-

तुम्हारी बकरियाँ, उसकी घोड़ी और मेरा बैल उस खेत में चरता है/चरते हैं।

3. यदि चिह्न-रहित अनेक कर्ता परस्पर किसी विभाजक (या, अथवा, वा आदि) से जुड़ेहों तो क्रिया अंतिम कर्ता के लिंग-वचन के अनुसार होती है।

जैसे-

मेरी बेटी या उसका बेटा पर्यावरण को महत्त्व नहीं देता।
स्थिति ऐसी है कि मोनू की गाय या मेरा बैल बिकेगा।

4. यदि चिह्न-रहित अनेक कर्त्ताओं और क्रियाओं के बीच में कोई समुदायवाचक शब्दआए तो क्रिया, लिंग और वचन में समुदायवाचक शब्द के अनुसार होगी।

जैसे-

अमरीका-तालिबान की लड़ाई में बच्चे, बूढ़े, जबान, औरतें सबके सब प्रभावित हुए ।
5. आदर के लिए एकवचन कर्ता के साथ बहुवचन क्रिया का प्रयोग होता है, यदि कर्ता  चिह्न-रहित हो तो

जैसे-

पिताजी आनेवाले हैं।
दादाजी रोज सुबह टहलने जाते हैं।
दादीजी चश्मा पहनकर बहुत सुन्दर लगती हैं।

6. यदि चिह्न-रहित अनेक कर्ताओं से बहुवचन का अर्थ निकले तो क्रिया बहुवचन औरयदि एकवचन का अर्थ निकले तो क्रिया एकवचन होती है; चाहे कर्ताओं के आगे समूहवाचकशब्द हों अथवा नहीं हों।

जैसे-

2007 की बाढ़ के कारण खेती बाड़ी घर-द्वार, धन-दौलत मेरा सब चला गया।
शिक्षक की प्रेरक बातें सुन मेरा उत्साह, धैर्य और आनंद बढ़ता चला गया।

7. जब कोई स्त्री या पुरुष अपने परिवार की ओर से या किसी समुदाय की ओर से जिसमेंस्त्री-पुरुष दोनों हों, कुछ कहता है तब वह स्त्री हो या पुरुष (कहनेवाला) अपने लिए पुं० बहुवचन क्रिया

जैसे-

ब्राह्मणी ने कंती से कहा, “न जाने हम बकासुर के अत्याचार से कब और कैसे छुटकाराका प्रयोग करता है।पाएँगे?”

8.चिहन-रहित मुख्य कर्ता के अनुसार क्रिया होती है, विधेय के अनुसार नहीं।

जैसे-

लड़की बीमारी के कारण सूखकर काठ हो गई।
वह लड़का आजकल लड़की बना हुआ है।

कर्म कारक
“जिस पर क्रिया (काम) का फल पड़े, ‘कर्म कारक’ कहलाता है।”

जैसे— 

तालिबानियों ने पाकिस्तान को रौंद डाला |
सुन्दर लाल बहुगुना ने ‘चिपको आन्दोलन’ चलाया।
इन दोनों वाक्यों में पाकिस्तान’ और ‘चिपको आन्दोलन’ कर्म हैं; क्योंकि ‘रौंद डालनाऔर ‘चलाना’ क्रिया से प्रभावित हैं। कर्म कारक का चिह्न ‘को’ है; परन्तु जहाँ ‘को’ चिह्न नहीं रहता है, वहाँ कर्म का शून्यचिह्न माना जाता है

जैसे-

वह रोटी खाता है
इन वाक्यों में ‘रोटी’ और ‘नाच’ दोनों के चिह्न-रहित कर्म हैं।कभी-कभी वाक्यों में दो दो कर्मों का प्रयोग भी देखा जाता है, जिनमें एक मुख्य कर्म और दूसरा गौण कर्म होता है। प्रायः वस्तुबोधक को मुख्य कर्म और प्राणिबोधक को गौण कर्म मानाजाता है।

जैसे— माँ ने बच्चे को दूध पिलाया ।
भालू नाच दिखाता है।
गौण कर्म मुख्य कर्म

क्रिया पर कर्म का प्रभाव :

1. यदि वाक्य में कर्म चिह्न रहित (शून्य) रहे और कर्त्ता में ‘ने’ लगा हो तो क्रिया कर्मके लिंग-वचन के अनुसार होती है।

जैसे-

कवि ने कविता सुनाई। माँ ने रोटी खिलाई।  मैंने एक सपना दतिलक ने महान् भारत का सपना देखा था।                          गुलाम अली ने एक अच्छी गज़ल सुनाई थी।               बन्दर ने कई केले खाए हैं।

2. यदि वाक्य में कर्ता और कर्म दोनों चिह्न युक्त हों तो क्रिया सदैव पुं० एकवचन होती
जैसे :-
स्त्रियों ने पुरुषों को देखा था।
चरवाहों ने गायों को चराया होगा।
शिक्षक ने छात्राओं को पढ़ाया है।
गाँधी जी ने सत्य और अहिंसा को महत्त्व दिया है।

3. क्रिया की अनिवार्यता प्रकट करने के लिए कर्त्ता में ‘ने’ की जगह ‘को’ लगाया जाताहै और क्रिया कर्म के लिंग वचन के अनुसार होती है।

जैसे-
उस माँ को बच्चा पालना ही होगा।
अंशु को एम. ए. करना ही होगा।
नूतन को पुस्तकें खरीदनी होंगी।

4. अशक्ति प्रकट करने के लिए कर्ता में ‘से’ चिह्न लगाया जाता है और कर्म को चिह्न-रहित । ऐसी स्थिति में क्रिया कर्म के लिंग वचन के अनुसार ही होती है।

जैसे-

  • रामानुजसे पुस्तक पढ़ी नहीं जाती।
  •  उससे रोटी खायी नहीं जाती है।
  • शीला से भात खाया नहीं जाता था।

5. यदि कर्ता चिह्न युक्त हो, पहला कर्म भी चिह्न-युक्त हो और दूसरा कर्म चिह्न-रहितरहे तो क्रिया दूसरे कर्म (मुख्य कर्म) के अनुसार होती है।

जैसे-

  • माता ने पुत्री को विदाई के समय बहुत धन दिया।
  • पिता ने पुत्री को पुत्र को बधाई दी।

करण कारक:

”वाक्य में जिस  साधन  माध्यम से क्रिया का सम्पादन होता है , उसे ही करण-कारक कहते है। ”
अर्थात् करण कारक साधन का काम करता है। इसका चिह्न ‘से’ है, कहीं-कहीं ‘द्वाराका प्रयोग भी किया जाता है।

जैसे-

चाहो, तो इस कलम से पूरी कहानी लिख लो।
पुलिस तमाशा देखती रही और अपहर्ता बलेरो से लड़की को ले भागा।
छात्रों को पत्र के द्वारा परीक्षा की सूचना मिली।

उपर्युक्त उदाहरणों में कलम, बलेरो और पत्र करण कारक हैं।कभी-कभी वाक्य में करण का चिह्न लुप्त भी रहता है, वहाँ भ्रमित नहीं होना चाहिए, सीधे क्रियाके साधन खोजने चाहिए;

जैसे— 

 किससे या किसके द्वारा काम हुआ अथवा होता है ?
उदाहरण—   मैं आपको आँखों देखी खबर सुना रहा हूँ। किससे देखी ? आँखों से
आज भी संसार में करोड़ों लोग भूखों मर रहे हैं।

सम्प्रदान कारक

“कर्ता कारक जिसके लिए या जिस उद्देश्य के लिए क्रिया का सम्पादन करता है, वह‘सम्प्रदान कारक’ होता है।”

जैसे—

मुख्य मंत्री नीतीश कुमार ने बाढ़ पीड़ितों के लिए अनाज और कपड़े बँटवाए |

इस वाक्य में ‘बाढ़-पीड़ित’ सम्प्रदान कारक है; क्योंकि अनाज और कपड़े बँटवाने का कामउनके लिए ही हुआ।
सम्प्रदान कारक का चिह्न ‘को’ भी है; लेकिन यह कर्म के ‘को’ की तरह नहीं ‘के लिएका बोध कराता है।

जैसे-

गृहिणी ने गरीबों को कपड़े दिए ।
माँ ने बच्चे को मिठाइयाँ दीं।

इसी तरह उपर्युक्त वाक्यों से ‘को’ हटाकर उन्हें पढ़ें और दोनों में तुलना करें। आप पाएँगे कि’को’ रहित वाक्य ज्यादा सुन्दर हैं; क्योंकि इन वाक्यों में ‘को’ का अनावश्यक प्रयोग हुआ है। कुछ वाक्यों में ‘को’ के प्रयोग से या तो अर्थ ही बदल जाता है या फिर वह बहुत ही भ्रामकहो जाता है।

नीचे लिखे वाक्यों को देखें-

प्रकृति ने रात्रि को विश्राम के लिए बनाया है।
भ्रामक भाव-(प्रकृति ने रात्रि इसलिए बनाई है कि वह विश्राम करे)
प्रकृति ने रात्रि विश्राम के लिए बनाई है।
सामान्य भाव—(प्रकृति ने रात्रि जीव-जन्तुओं के विश्राम के लिए बनाई है)

1. व्यक्तिवाचक, अधिकारवाचक और व्यापार कर्तृवाचक में ‘को’ का प्रयोग किया जाता है।

जैसे-

मेघा को पढ़ने दो।

फैक्ट्री के मालिक को समझाना चाहिए।
अपने सिपाही को बुलाओ।
वह अपने नौकर को कभी-कभी मारता भी है।

2. गौण कर्म या सम्प्रदान कारक में ‘को’ का प्रयोग होता है।

जैसे-   

मैंने उसको पुस्तक खरीद दी। (उसके लिए)
उसने भूखों को अन्न और नंगों को वस्त्र दिए।

3. आना, छजना, पचना, पड़ना, भाना, मिलना, रुचना, लगना, शोभना, सुहाना, सूझना, होनाऔर चाहिए इत्यादि के योग में ‘को’ का प्रयोग होता है।

जैसे-

उन्हें याद आती है, आपकी प्रेरक बातें।
उसको भोजन नहीं पचता है।

4.निमित्त, आवश्यकता और अवस्था द्योतन में ‘को’ का प्रयोग होता है।

जैसे-

राम शबरी से मिलने को आए थे।
पिताजी स्नान को गए हैं।
अब मुझको पढ़ने जाना है।
उनको यहाँ फिर फिर आना होगा।

5. योग्य, उपयुक्त, उचित, आवश्यक, नमस्कार, धिक्कार और धन्यवाद के योग में ‘को’ काप्रयोग होता है।

जैसे-

स्वच्छ वायु सेवन आपको उपयोगी होगा।
विद्यार्थी को ब्रह्मचर्य रखना उचित है।

6.समय, स्थान और विनिमय-द्योतक में ‘को’ का प्रयोग होता है। जैसे-
पंजाब मेल भोर को आएगी।
वह घोड़ा कितने को दोगे?

7. समाना, चढ़ना, खुलना, लगाना, होना, डरना, कहना और पूछना क्रियाओं के योग में भी ‘को’ का प्रयोग होता है।

जैसे-

आपको भूत समाया है जो ऐसी-वैसी हरकतें कर रहे हैं।
उस विद्यार्थी को पढ़ाई का भूत चढ़ा है।
वह किसी काम का नहीं, उसको आग लगाओ।
तुमको एक बात कहता हूँ, किसी से मत कहना।
नोट : ‘होना’ क्रिया के साथ अस्तित्व अर्थ में ‘को’ के बदले ‘के’ भी लाया जाता है।

8. निम्नलिखित अवस्थाओं में ‘को’ प्रायः लुप्त रहता है; परन्तु विशेष अर्थ में स्वराघात के बदले कहीं-कहीं आता भी है, छोटे-छोटे जीवों एवं अप्राणिवाचक संज्ञाओं के साथ ।

जैसे—

उसने बिल्ली मारी है।
किधर तुम छोड़कर मुझको सिधारे, हे राम!
मगर एक जुगनू चमकते जो देखा मैंने.
वह सुबह आया है।

अपादान कारक

“वाक्य में जिस स्थान या वस्तु से किसी व्यक्ति या वस्तु की पृथकता अथवा तुलना का बोध होता है, वहाँ अपादान कारक होता है।”
यानी अपादान कारक से जुदाई या विलगाव का बोध होता है। प्रेम, घृणा, लज्जा, ईर्ष्या,भय और सीखने आदि भावों की अभिव्यक्ति के लिए अपादान कारक का ही प्रयोग किया जाता है; क्योंकि उक्त कारणों से अलग होने की क्रिया किसी-न-किसी रूप में जरूर होती है।

जैसे-

पतझड़ में पीपल और ढाक के पेड़ों से पत्ते झड़ने लगते हैं।
वह अभी तक हैदराबाद से नहीं लौटा है।
मेरा घर शहर से दूर है।
उसकी बहन मुझसे लजाती है ।
खरगोश बाघ से बहुत डरता है।
नूतन को गंदगी से बहुत घृणा है।
हमें अपने पड़ोसी से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए।
मैं आज से पढ़ने जाऊँगा।

से’ का प्रयोग

‘से’ चिह्न ‘करण’ एवं ‘अपादान’ दोनों कारकों का है; किन्तु प्रयोग में काफी अंतर है। करण कारक का ‘से’ माध्यम या साधन के लिए प्रयुक्त होता है, जबकि अपादान का ‘से’ जुदाई या अलग होने या करने का बोध कराता है। करण का ‘से’ साधन से जुड़ा रहता है। जैसे- वह कलम से लिखता है। (साधन) उसके हाथ से कलम गिर गई। (हाथ से अलग होना)

1. अनुक्त और प्रेरक कर्त्ता कारक में ‘से’ का प्रयोग होता है।

जैसे—

मुझसे रोटी खायी जाती है। (मेरे द्वारा)
आपसे ग्रंथ पढ़ा गया था। (आपके द्वारा)

2. क्रिया करने की रीति या प्रकार बताने में भी ‘से’ का प्रयोग होता है ।

जैसे-

धीरे (से) बोलो, कोई सुन लेगा।
जहाँ भी रहो, खुशी से रहो ।

3. मूल्यवाचक संज्ञा और प्रकृति बोध में ‘से’ का प्रयोग देखा जाता है।

जैसे—

कल्याण कंचन से मोल नहीं ले सकते हो।
छूने से गर्मी मालूम होती है।
वह देखने से संत जान पड़ता है।

4. कारण, साथ, द्वारा, चिह्न, विकार, उत्पत्ति और निषेध में भी ‘से’ का प्रयोग होता है।

जैसे

आलस्य से वह समय पर न आ सका।
दया से उसका हृदय मोम हो गया ।
गर्मी से उसका चेहरा तमतमाया हुआ था।

5. अपवाद (विभाग) में ‘से’ का प्रयोग अपादान के लिए होता है।

जैसे-

वह ऐसे गिरा मानो आकाश से तारे।
वह नजरों से ऐसे गिरा, जैसे पेड़ से पत्ते ।

6. पूछना, दुहना, जाँचना, कहना, पकाना आदि क्रियाओं के गौण कर्म में से’ का प्रयोग होता है।

जैसे- 

मैं आपसे पूछता हूँ, वहाँ क्या-क्या सुना है ?

भिखारी धनी से कहीं जाँचता तो नहीं है?
मैं आपसे कई बार कह चुकी हूँ।
बाबर्ची चावल से भात पकाता है।

7. मित्रता, परिचय, अपेक्षा, आरंभ, परे, बाहर, रहित, हीन, दूर, आगे, पीछे, ऊपर, नीचे, अतिरिक्त, लज्जा, बचाव, डर, निकालना इत्यादि शब्दों के योग में ‘से’ का प्रयोग देखा जाता है।

जैसे-

  • संजय भांद्रा अपने सभी भाइयों से अलग है।
  • उनको इन सिद्धांतों से अच्छा परिचय है।
  • धन से कोई श्रेष्ठ नहीं होता, विद्या से होता है।

8.स्थान और समय की दूरी बताने में भी ‘से’ का प्रयोग होता है।

जैसे-

अभी भी गरीबों से दिल्ली दूर है।
आज से कितने दिन बाद आपका आगमन होगा?

9.क्रियाविशेषण के साथ भी से’ का प्रयोग होता है।

जैसे-

आप कहाँ से टपक पड़े भाई जान ?
किधर से आगमन हो रहा है श्रीमान् का ?

10. पूर्वकालिक क्रिया के अर्थ में भी ‘से’ का प्रयोग होता है।

जैसे-

उसने पेड़ से बंदूक चलाई थी।
(पेड़ पर चढ़कर)
कोठे से देखो तो सब कुछ दिख जाएगा। (कोठे पर चढ़कर)
कुछ स्थलों पर ‘से’ लुप्त रहता है—

जैसे-

बच्चा घुटनों चलता है।

संबंध कारक
“वाक्य में जिस पद से किसी वस्तु, व्यक्ति या पदार्थ का दूसरे व्यक्ति, वस्तु या पदार्थ सेसंबंध प्रकट हो, ‘संबंध कारक’ कहलाता है।”

जैसे-

अंशु की बहन आशु है।
यहाँ ‘अंशु’ संबंध कारक है।

यों तो संबंध और संबोधन को कारक माना ही नहीं जाना चाहिए, क्योंकि इसका संबंध क्रिया से किसी रूप में नहीं होता। हाँ, कर्त्ता से अवश्य रहता है।

जैसे-

भीम के पुत्र घटोत्कच ने कौरवों के दाँत खट्टे कर दिए।

उक्त उदाहरण में हम देखते हैं कि क्रिया की उत्पत्ति में अन्य कारकों की तरह संबंध सक्रियनहीं है।

फिर भी, परंपरागत रूप से संबंध को कारक के भेदों में गिना जाता रहा है। इसका एकमात्रचिह्न ‘का’ है, जो लिंग और वचन से प्रभावित होकर ‘की’ और ‘के’ बन जाता है। इन उदाहरणों को देखें-
गंगा का पुत्र भीष्म बाण चलाने में बड़े-बड़ों के कान काटते थे।
नदी के किनारे-किनारे वन-विभाग ने पेड़ लगवाए।
मेनका की पुत्री शकुन्तला भरत की माँ बनी।

 ‘का-के-की’ का प्रयोग
सम्पूर्णता, मूल्य, समय, परिमाण, व्यक्ति, अवस्था, दर, बदला, केवल, स्थान, प्रकार,योग्यता, शक्ति, साथ, भविष्य, कारण, आधार, निश्चय, भाव, लक्षण, शीघ्रता आदि के लिएसंबंध कारक के चिह्नों का प्रयोग होता है।

जैसे-

सबके-सब चले गए रह गए केवल तुम ।
अचंभे की बात सुनने योग्य ही होती है।
अब यह विपत्ति की घड़ी टलनेवाली ही है।
राह का थका बटोही गहरी नींद सोता है।
आज भी दूध-का-दूध और पानी-का-पानी होता है।
दिन का सोना और रात का करवटें बदलना कभी अच्छा नहीं होता।
बात की बात में बात निकल आती है।

 अधिकरण कारण

“वाक्य में क्रिया का आधार, आश्रय, समय या शर्त अधिकरण’ कहलाता है।” 

आधार को ही अधिकरण माना गया है। यह आधार तीन तरह का होता है-स्थानाधार,समयाधार और भावाधार।
जब कोई स्थानवाची शब्द क्रिया का आधार बने तब वहाँ स्थानाधिकरण होता है |

जैसे-

बन्दर पेड़ पर रहता है।
चिड़ियाँ पेड़ों पर अपने घोंसले बनाती हैं।
मछलियाँ जल में रहती हैं।
मनुष्य अपने घर में भी सुरक्षित कहाँ रहता है।

जब कोई कालवाची शब्द क्रिया का आधार हो तब वहाँ कालाधिकरण होता है।

जैसे-

मैं अभी दो मिनटों में आता हूँ।

जब कोई क्रिया ही क्रिया के आधार का काम करे, तब वहाँ भावाधिकरण होता है।
जैसे-
शरद पढ़ने में तेज है।
राजलक्ष्मी दौड़ने में तेज है।

कहीं-कहीं अधिकरण कारक के चिह्न (में, पर) लुप्त भी रहते हैं।

जैसे-

आजकल वह राँची रहता है।
मैं जल्द ही आपके दफ्तर पहुँच रहा हूँ।
ईश्वर करे, आपके घर मोती बरसे ।

‘में’ और ‘पर’ का प्रयोग

1. निर्धारण, कारण, भीतर, भेद, मूल्य, विरोध, अवस्था और द्वारा अर्थ में अधिकरण काचिह्न आता है।

जैसे-

स्थलीय जीवों में हाथी सबसे बड़ा पशु है।
पहाड़ों में हिमालय सबसे बड़ा और ऊँचा है |
पाकिस्तान और तालिबान में कोई फर्क नहीं है।

2. अनुसार, सातत्य, दूरी, ऊपर, संलग्न और अनंतर के अर्थों में और वार्तालाप के प्रसंगमें ‘पर’ चिह्न का प्रयोग होता है।

जैसे-

नियत समय पर काम करो और उसका मीठा फल खाओ।
घोड़े पर चढ़नेवाला हर कोई घुड़सवार नहीं हो जाता।
यहाँ से पाँच किलोमीटर पर गंगा बहती है।
इस पर वह क्रोध से बोला और चलते बना.
मैं पत्र-पर-पत्र भेजता रहा और तुम चुपचाप बैठे रहे ।

3. गत्यर्थक धातुओं के साथ में’ और ‘पर’ दोनों आते हैं।

जैसे-

वह डेरे पर गया होगा।
मैं आपकी शरण में आया हूँ।

संबोधन कारक

“जिस संज्ञापद से किसी को पुकारने, सावधान करने अथवा संबोधित करने का बोध हो,’संबोधन’ कारक कहते हैं।”
संबोधन प्रायः कर्त्ता का ही होता है, इसीलिए संस्कृत में स्वतंत्र कारक नहीं माना गया है।संबोधित संज्ञाओं में बहुवचन का नियम लागू नहीं होता और सर्वनामों का कोई संबोधन नहींहोता, सिर्फ संज्ञा पदों का ही होता है।

नीचे लिखे वाक्यों को देखें-

भाइयो एवं बहनो! इस सभा में पधारे मेरे सहयोगियो ! मेरा अभिवादन स्वीकार करें।
हे भगवान् ! इस सड़ी गर्मी में भी लोग कैसे जी रहे हैं।
बच्चो ! बिजली के तार को मत छूना ।
देवियो और सज्जनो ! इस गाँव में आपका स्वागत है।

नोट : सिर्फ संबोधन कारक का चिह्न संबोधित संज्ञा के पहले आता है।

लेख के बारे में-

इस आर्टिकल में हमने “कारक क्या है ? परिभाषा भेद उदहारण सहित” के बारे में पढे। अगर इस Notes रिसर्च के बाद जानकारी उपलब्ध कराता है, इस बीच पोस्ट पब्लिश करने में अगर कोई पॉइंट छुट गया हो, स्पेल्लिंग मिस्टेक हो, या फिर आप-आप कोई अन्य प्रश्न का उत्तर ढूढ़ रहें है तो उसे कमेंट बॉक्स में अवश्य बताएँ अथवा हमें notesciilgrammars@gmail.com पर मेल करें।

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